- धूम्रपान मुक्त पीढ़ी ही है स्वस्थ भविष्य की बुनियाद (नो स्मोकिंग डे (11 मार्च) पर विशेष) आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है लेकिन दुर्भाग्य से धूम्रपान और तंबाकू की लत इस अमूल्य धन को तेजी से नष्ट कर रही है। हर साल मार्च के दूसरे बुधवार को ‘नो स्मोकिंग डे’ मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य लोगों को धूम्रपान की आदत छोड़ने के लिए प्रेरित करना और समाज को तंबाकू के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना है। इस वर्ष यह दिवस 11 मार्च को मनाया जा रहा है। यह एक ऐसा अवसर है, जब लोग अपने जीवन में एक नई शुरुआत कर सकते हैं और धूम्रपान मुक्त जीवन की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। हर वर्ष इस दिन एक विशेष थीम के साथ लोगों को तंबाकू से दूर रहने का संदेश दिया जाता है। इस वर्ष का संदेश है ‘धूम्रपान से मुक्त जीवन की शुरुआत एक धूम्रपान-मुक्त दिन से होती है।’ इसका अर्थ स्पष्ट है कि यदि कोई व्यक्ति केवल एक दिन भी धूम्रपान से दूरी बना ले तो वह आगे चलकर इसे पूरी तरह छोड़ने की दिशा में पहला कदम उठा सकता है। तंबाकू और निकोटीन की लत दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तंबाकू के कारण हर वर्ष लगभग 80 लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें से करीब 70 लाख लोग सीधे धूम्रपान करने वाले होते हैं जबकि लगभग 12 लाख लोग ऐसे होते है, जो स्वयं धूम्रपान नहीं करते लेकिन दूसरों के धुएं के संपर्क में आने के कारण गंभीर बीमारियों का शिकार बन जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि धूम्रपान केवल करने वाले व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उसके आसपास रहने वाले परिवार और समाज को भी प्रभावित करता है। हाल के वर्षों में देखा गया है कि दुनिया के कई देशों में धूम्रपान करने वालों की संख्या में कमी आई है लेकिन इसके बावजूद चिंता का विषय यह है कि युवाओं और किशोरों में तंबाकू के उपयोग की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार 13 से 15 वर्ष की आयु के लगभग 3.7 करोड़ बच्चे किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। ई-सिगरेट और अन्य नए निकोटीन उत्पादों ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। आकर्षक पैकेजिंग, फ्लेवर और डिजिटल मार्केटिंग के जरिए इन उत्पादों को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की कोशिश की जा रही है। विज्ञापन प्रतिबंधों के बावजूद सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से युवाओं को लक्ष्य बनाकर प्रचार किया जाता है। इस कारण किशोरों में तंबाकू की लत तेजी से फैल रही है, जो भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है। तंबाकू के दुष्प्रभाव केवल कैंसर तक सीमित नहीं हैं। यह शरीर के लगभग हर अंग को नुकसान पहुंचाता है। धूम्रपान फेफड़ों के कैंसर का प्रमुख कारण है और दुनिया में होने वाली फेफड़ों के कैंसर से लगभग 85 प्रतिशत मौतें धूम्रपान के कारण होती हैं। इसके अलावा तंबाकू हृदय रोग, स्ट्रोक, दमा, ब्रोंकाइटिस और कई अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों को जन्म देता है। लंबे समय तक तंबाकू का सेवन करने से मुंह, गले, पेट, लीवर और आंतों के कैंसर का खतरा भी बढ़ जाता है। तंबाकू की समस्या भारत में भी काफी गंभीर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 15 वर्ष या उससे अधिक आयु के 25 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं। इनमें अधिकांश पुरुष हैं लेकिन महिलाओं में भी इसका उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। भारत में तंबाकू सेवन के कई रूप प्रचलित हैं, जैसे खैनी, गुटखा, पान मसाला, जर्दा और सुपारी के साथ तंबाकू का सेवन। इन उत्पादों की आसान उपलब्धता और कम कीमत के कारण लोग जल्दी इसकी लत के शिकार हो जाते हैं। विभिन्न शोधों में यह भी सामने आया है कि तंबाकू से होने वाली बीमारियों का इलाज बहुत महंगा होता है। यदि तंबाकू के उपयोग को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका आर्थिक बोझ बहुत अधिक बढ़ सकता है। मुंह के कैंसर के मामलों में भारत पहले से ही दुनिया के कई देशों से आगे है और इसका मुख्य कारण तंबाकू तथा गुटखे का व्यापक उपयोग है। धूम्रपान केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक और सामाजिक समस्याओं को भी जन्म देता है। तंबाकू की लत व्यक्ति को धीरे-धीरे निर्भर बना देती है। कई युवाओं में यह लत अवसाद, चिंता और आत्मविश्वास की कमी जैसी मानसिक समस्याओं को भी जन्म देती है। जब किशोरावस्था में यह आदत लग जाती है तो उसे छोड़ना बेहद कठिन हो जाता है और इसका प्रभाव उनके पूरे जीवन पर पड़ता है। धूम्रपान के खतरों को देखते हुए समाज में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है। सरकारों ने तंबाकू नियंत्रण के लिए कई कानून बनाए हैं, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाया है और तंबाकू उत्पादों पर चेतावनी संदेश भी अनिवार्य किए हैं। इसके बावजूद केवल कानून से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए सामाजिक जागरूकता और व्यक्तिगत संकल्प दोनों जरूरी हैं। पत्रकारिता के अपने लंबे अनुभव के दौरान मैंने नशे के दुष्प्रभावों पर व्यापक अध्ययन किया है। वर्ष 1993 में मेरी पुस्तक ‘मौत को खुला निमंत्रण’ प्रकाशित हुई थी, जिसमें तंबाकू और अन्य नशों से होने वाले भयानक परिणामों का विस्तार से उल्लेख किया गया था। उस समय भी यह चेतावनी दी गई थी कि यदि समाज ने समय रहते नशे के खिलाफ जागरूकता नहीं बढ़ाई तो इसके दुष्परिणाम आने वाली पीढ़ियों को भुगतने पड़ेंगे। आज तीन दशक बाद भी यह चिंता उतनी ही प्रासंगिक दिखाई देती है। बहरहाल, नो स्मोकिंग डे हमें याद दिलाता है कि जीवन का हर पल अमूल्य है और इसे किसी भी तरह की लत के कारण बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। धूम्रपान छोड़ना कठिन अवश्य है लेकिन असंभव नहीं। यदि व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर ले और परिवार तथा समाज का सहयोग मिले तो वह आसानी से इस लत से मुक्त हो सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम स्वयं भी धूम्रपान से दूर रहें और दूसरों को भी इसके खतरों के बारे में जागरूक करें। आखिरकार, एक स्वस्थ समाज की शुरुआत स्वस्थ व्यक्तियों से ही होती है। यदि हम तंबाकू से दूरी बनाकर जीवन को अपनाएं तो न केवल अपना स्वास्थ्य सुरक्षित रख सकते हैं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक बेहतर और सुरक्षित वातावरण तैयार कर सकते हैं। इसलिए इस नो स्मोकिंग डे पर संकल्प लें कि तंबाकू का साथ छोड़कर हर सांस को कीमती बनाएंगे और जीवन को स्वस्थ, सुरक्षित और खुशहाल बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएंगे। (लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं तथा वर्ष 1993 में नशे के दुष्प्रभावों पर पुरस्कृत पुस्तक ‘मौत को खुला निमंत्रण’ लिख चुके हैं) ईएमएस / 10 मार्च 26