राज्य
11-Mar-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि अदालत से बाइज्जत बरी होना व परिस्थितियों के कारण साक्ष्यों की कमी से बरी होने में अंतर है। इसलिए साक्ष्यों की खामी के कारण बरी होने को निरपराध नहीं माना जा सकता। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसे शख्स को दिल्ली पुलिस फोर्स का हिस्सा बनने से रोके जाने को सही माना है, जिस पर गंभीर अपराधिक मुकदमा दर्ज हो चुका है। हालांकि, यह शख्स सबूतों के अभाव में इस मामले से बरी हो गया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि अदालत से बाइज्जत बरी होना व परिस्थितियों के कारण साक्ष्यों की कमी से बरी होने में अंतर है। इसलिए साक्ष्यों की खामी के कारण बरी होने को निरपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल व जस्टिस अमित महाजन की डिवीजन बेंच ने युवक की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि वह दिल्ली पुलिस जैसी अनुशासनात्मक फोर्स का हिस्सा बनने के लायक नहीं है। वह एक गंभीर अपराध के मामले में आरोपी रहा है। बेंच ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि अदालत से बरी होना ही काफी नहीं होता। किसी व्यक्ति को निर्दोष तब माना जाता है जब उसके खिलाफ कोई साक्ष्य या गवाह ही ना मिले, लेकिन जहां गवाह अपने बयानों से मुकर जाएं अथवा आरोपी व गवाहों के बीच समझौता होने की वजह से आरोपी बरी हो जाए, तो उसे निर्दोष नहीं माना जा सकता। बेंच ने इस युवक की दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल पद पर नियुक्ति पर रोक को उचित माना है। हाईकोर्ट में पेश मामले के मुताबिक, याचिकाकर्ता युवक के पिता दिल्ली पुलिस में तैनात थे। उनकी वर्ष 2013 में मृत्यु हो गई थी। याचिकाकर्ता का नाम साल 2014 में दिल्ली पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल (लिपिक वर्ग) के पद पर अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति के लिए मंजूर किया गया था। इस बीच इस युवक के चरित्र व पिछली जानकारी के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू हुई। चरित्र सत्यापन के दौरान यह पता चला कि याचिकाकर्ता पर अलग-अलग प्रावधान के तहत एफआईआर नंबर 138/2009 के जरिये आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ ईएमएस/11/मार्च /2026