लेख
11-Mar-2026
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जन्म चैत्र माह शुक्ल पक्ष नवमी ( 12 मार्च 2026) स्थान :शास्वत तीर्थ अयोध्या जैन परंपरा में 24 तीर्थंकर हुए हैं जिनमे पहले तीर्थंकर श्री ऋषभदेव और 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर हुए हैं । जैन धर्म आदि अनंत है फिर भी प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव इसके प्रवर्तक माने जाते हैं । भगवान ऋषभदेव का जन्म तीसरे काल के अंत में जब भोग भूमि की व्यवस्था नष्ट हो चुकी थी और कर्म भूमि की रचना प्रारम्भ हो रही थी तब अयोध्या के अंतिम मनु कुलकर श्री नाभिराज जी के घर उनकी पत्नी मरुदेवी से चैत्र शुक्ल नवमी के दिन अयोध्या में जन्म हुआ था । कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने के बाद बिना बोए धान से लोगों की आजीविका होती थी, परंतु कालचक्र से जब धान ही नष्ट हो गया,तब लोग भूख से पीड़ित होकर सभी राजा नाभिराज के पास पहुंचकर त्राहि त्राहि करने लगे। राजा नाभिराज प्रजा को अपने पुत्र ऋषभदेव जी के पास ले गए, लोगों ने अपनी करुण व्यथा उनके सामने प्रकट की , प्रजाजनों की व्यथा देखकर भगवान ऋषभदेव द्रवीभूत हो उठे और उन्होंने अवधी ज्ञान से विदेह क्षेत्र की व्यवस्था का स्मरण कर इस भारत क्षेत्र में वही व्यवस्था चालू करने का निश्चय किया। भगवान ऋषभदेव ने असि-तलवार (सुरक्षा) मसि-लेखन कार्य, कृषि- खेती विद्या-संगीत नृत्यगान शिल्प-वस्तुओं का निर्माण वाणिज्य-व्यापार इन 6 कार्यों का उपदेश दिया तथा जानता को समझाया की भोग भूमि थी जिसमे कल्पवृक्षों से भोगोप भोग की सामग्री मिलती थी, अब कर्मभूमि प्रारम्भ हो रही है , यह कर्म करने का युग है । कार्य किए बिना कोई जीवित नहीं रह सकता है । असि , मासी, कृषि, विद्या,वाणिज्य और शिल्प ये 6 कर्म हैं इन कर्मों से आप लोग अपनी आजीविका चलायें। भगवान ऋषभदेव ने तीन वर्णों की स्थापना की, छत्रीय वैश्य और शुद्र छत्रीय- भगवान ऋषभदेव ने बलवान लोगों को शास्त्र धारण करने की शिक्षा दी जो आतताइयों से निर्बल लोगों की रक्षा करें । इन लीगों को छत्रीय वर्ण की संज्ञा दी वैश्य- भगवान ऋषभदेव ने विहार करते हुए लोगों को शिक्षा दी की जो लोग एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर तैयार वस्तुओं को पहुंचाएं उनको वैश्य वर्ण की संज्ञा दी शुद्र - भगवान ऋषभदेव ने बताया कि यह कर्मयुग है, और कर्म बिना सहयोग के नहीं हो सकता है अतः उन्होंने पारस्परिक सहयोग करने वालों की आवश्यकता है, बहुत से लोगों ने इसे सेवावृत्ति के रूप में अपनाया, आदि ब्रह्मा ने इन्हें शुद्र की संज्ञा दी । इस तरह कर्म भूमि श्रष्टि के प्रारंभ में में आदि ब्रह्मा ने छत्रीय वैश्य और शुद्र वर्ण की स्थापना की । भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती के मन में आया कि मैंने दिग्विजय के द्वारा बहुत साधन इकट्ठा किया है और अन्य लोग भी अपनी शक्ति के अनुसार धन एकत्रित करते हैं आख़िर उसका त्याग कहाँ किया जाए ? उसका पात्र किसे बनाया जाये? इसी के साथ उन्होंने अनुभव किया की कुछ बुद्धिजीवी हों तो उनको तीनो वर्गों को सदा बौद्धिक सामग्री मिलती रहे, चक्रबर्ती भरत महाराज ने लोगों की बौद्धिक क्षमता की परीक्षा लेकर उन्हें ब्राह्मण वर्ग की संज्ञा दी । उस समय की सारी व्यवस्था भगवान ऋषभदेव ने की, यही आदि पुरुष, ब्रह्मा, विधाता आदि संज्ञाओं से अवतरित हुए । राजा नाभिराज के पुत्र ऋषभदेव ने महरानी यशस्वती और सुनंदा से विवाह किया तथा नाभिराज के महान आग्रह पर राज्य का भार स्वीकार किया, कालक्रम से महारानी यशस्वती से चक्रवर्ती भरत आदि 100 पुत्र तथा भ्रामनी नामक पुत्री हुई और रानी सुनंदा से बाहुबली पुत्र तथा सुंदरी नामक पुत्री उत्पन्न हुई । भगवान ऋषभदेव ने अपने पुत्र पुत्रियों को अनेक जनकल्याणी विद्याएँ पढ़ाई, जिसके द्वारा समस्त प्रजा में पठन पाठन की व्यवस्था प्रारम्भ हुई । कालक्रम से भगवान ऋषभदेव को वैराग्य हुआ और अपने बड़े पुत्र भरत चक्रवर्ती को स्वामित्व देकर दीक्षा धारण की । दीक्षा के बाद ऋषभदेव जी ने 6 माह का योग लिया था कि 6 माह बाद ही आहार ग्रहण करेंगे। 6 माह समाप्त होने के पश्चात ऋषभदेव जी आहारों को निकले , उस समय लोगों को मुनियों को आहार देने की विधि मालूम नहीं थी जिससे विधि ना मिलने के कारण 6 माह तक भ्रमण करते रहे और आहार नहीं लिया । ऋषभदेव जी अयोध्या से विहार करते हुए हस्तनापुर पहुँचे वहाँ के राजा सोमप्रभ एवम उनके छोटे भाई श्रेयांश थे, दोनों को भगवान को देखते हुए जाती स्मरण हुआ और उन्होंने भगवान ऋषभदेव को पढ़गाहन और इच्छू रस (गन्ने का रस ) का आहार दिया । यह आहार का दिन अक्षय तृतीया के नाम से प्रसिद्ध हुआ । आहार लेने के बाद भगवान वन में चले गए । 1000 वर्ष के तपश्चरण के बाद उन्हें दिव्य ज्ञान, केवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ और वह सर्वज्ञ हो गए । भगवान ऋषभदेव ने सर्वज्ञ ज्ञान से दिव्य ध्वनि के द्वारा संसार के प्राणियों को हित उपदेश दिए और उनका समस्त आर्यखण्ड में विहार हुआ । 84 लाख पूर्व आयु के अंतिम समय में वे कैलाश पर्वत पर पहुँचे और वहीं से उन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया । भगवान ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती के नाम से देश का नाम भारत रखा गया । भगवान ऋषभदेव और सम्राट चक्रवर्ती इतने प्रभावशाली पुण्य पुरुष हुए जिनका उल्लेख जैन ग्रंथों के अलावा जैनत्तर पुराणों उपनिषदों , भागवत, मार्कडेपुराण, अग्निपुराण, विष्णुपुराण आदि ग्रंथों में उल्लेख मिलता है । श्रीजी की महिमा अगम है,कोई न पावे पार । मैं मति अल्प अज्ञान हूँ,कौन करे विस्तार संतोष जैन /11 मार्च2026