* न्यूनतम बाहरी इनपुट, स्वदेशी सूक्ष्मजीवों पर निर्भरता और जैव विविधता को बढ़ावा देने वाली प्राकृतिक खेती में मल्चिंग की तीन प्रभावी विधियाँ अहमदाबाद (ईएमएस)| प्राकृतिक खेती एक ऐसी कृषि पद्धति है जिसमें बाहरी रासायनिक इनपुट का उपयोग नहीं किया जाता। इस पद्धति से ज़हर-मुक्त खाद्यान्न का उत्पादन होता है और साथ ही मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार होता है। यही कारण है कि भारत में प्राकृतिक खेती का दायरा लगातार बढ़ रहा है। इसके प्रमुख सिद्धांतों में न्यूनतम बाहरी इनपुट का उपयोग, स्वदेशी सूक्ष्मजीवों पर निर्भरता, मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना तथा जैव विविधता को प्रोत्साहित करना शामिल है। आच्छादन क्या है? मिट्टी की ऊपरी सतह पर रहने वाले सूक्ष्म जीवों और देशी केंचुओं को प्रतिकूल परिस्थितियों—जैसे तूफान, अत्यधिक वर्षा, गर्मी, ठंड या अन्य प्राकृतिक जोखिमों—से बचाने के लिए मिट्टी को प्राकृतिक आवरण से ढक दिया जाता है। इस प्रक्रिया को आच्छादन (मल्चिंग) कहा जाता है। यह मिट्टी में अनुकूल सूक्ष्म वातावरण बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है। आच्छादन के प्रकार : प्राकृतिक खेती में आच्छादन मुख्य रूप से तीन प्राकृतिक तरीकों से किया जाता है। 1. मृदाच्छादन: अधिक तापमान के कारण मिट्टी से कार्बन वातावरण में मिल जाता है और मिट्टी की नमी कम हो जाती है। अत्यधिक गर्मी या ठंड के कारण मिट्टी में फैलाव और संकुचन होता है, जिससे दरारें पड़ जाती हैं। इन दरारों से नमी वाष्प बनकर उड़ जाती है, जिससे मिट्टी के सूक्ष्मजीवों और फसलों की जड़ों को नुकसान पहुँचता है। इससे बचाव के लिए हल्की जुताई करके मिट्टी को ढकना आवश्यक है। मिट्टी तथा वनस्पति अवशेषों से जमीन को ढकने की प्रक्रिया को मृदाच्छादन कहा जाता है। इससे खरपतवार नष्ट होते हैं, मिट्टी की जल-धारण क्षमता बढ़ती है और नमी लंबे समय तक बनी रहती है। 2. काष्ठाच्छादन: फसल के अवशेषों से मिट्टी को ढकने की विधि को काष्ठाच्छादन कहा जाता है। कटाई के बाद खेत की सतह को फसल के अवशेषों से ढक देने पर आच्छादन के सभी लाभ मिलते हैं। साथ ही फसल द्वारा उपयोग किए गए पोषक तत्व अवशेषों के माध्यम से पुनः मिट्टी में मिल जाते हैं। इस पद्धति में खेत की ऊपरी सतह को लगभग चार इंच तक फसल के अवशेषों से ढका जाता है, जिससे खरपतवार का उगना लगभग बंद हो जाता है क्योंकि बीजों को अंकुरित होने के लिए आवश्यक सूर्य प्रकाश नहीं मिल पाता। 3. सजीव आच्छादन: मुख्य फसल के साथ सहफसल उगाकर किया जाने वाला आवरण सजीव आच्छादन कहलाता है। इससे आच्छादन के सभी लाभ प्राप्त होते हैं और सहफसल से अतिरिक्त आय भी मिलती है। यदि मुख्य फसल रोगों के प्रति संवेदनशील हो, तो उसके साथ ऐसी सहफसलें लगाई जानी चाहिए जिनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक हो। इससे मुख्य फसल में रोग का प्रभाव कम हो जाता है और प्राकृतिक रूप से रोग नियंत्रण संभव होता है।\ सतीश/11 मार्च