भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संसद है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद, बहस और जवाबदेही का भी केंद्र है। ऐसे में यदि विपक्ष के प्रमुख नेता को अपनी बात रखने का अवसर न मिले, तो यह लोकतांत्रिक परंपराओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। हाल के दिनों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को संसद में बोलने से रोकने को लेकर लगातार विवाद उठता रहा है। आखिर वो ऐसा क्या बोल देंगे जिससे सत्तापक्ष घबरा जायेगा ? मान लिया जाये कि उन्होंने कुछ कहा तो आप तो सत्तापक्ष है अपना बड़प्पन दिखाते हुए संसद में उन्हें सही कर दें? वहीं इससे लगता है कि सत्तापक्ष उन्हें अधिक फुटेज देना नहीं चाहता। कभी राहुल गांधी को पप्पू की संज्ञा देने में भाजपा ने करोड़ों खर्च कर दिए। वहीं राहुल गांधी ने एक परिपक्व नेता की तरह अपने को साबित कर दिया है कि उनके सवालों का जबाव भाजपा के पास नहीं है ? विपक्ष का आरोप है कि जब भी राहुल गांधी सरकार की नीतियों, आर्थिक मुद्दों या विदेश नीति पर सवाल उठाना चाहते हैं, तब सत्ता पक्ष शोर-शराबा या प्रक्रियात्मक आपत्तियों के जरिए उनकी आवाज दबाने की कोशिश करता है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे लोकतंत्र की आत्मा के खिलाफ बताते हैं। उनका कहना है कि संसद में चुने हुए प्रतिनिधि को बोलने से रोकना जनता की आवाज को रोकने के समान है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क अलग है। भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि राहुल गांधी कई बार ऐसे आरोप लगाते हैं जो तथ्यों पर आधारित नहीं होते या संसद की गरिमा के खिलाफ होते हैं। इसलिए जब तक वे अपने आरोपों के लिए ठोस प्रमाण नहीं देते, तब तक उन्हें बिना रोक-टोक बोलने देना उचित नहीं माना जाता। भाजपा नेताओं का यह भी कहना है कि संसद में नियम और प्रक्रियाएं हैं, जिनका पालन सभी सदस्यों को करना चाहिए। इस पूरे विवाद में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी चर्चा में रहती है। लोकसभा के स्पीकर पर विपक्ष अक्सर यह आरोप लगाता है कि वे सत्ता पक्ष के दबाव में विपक्ष को पर्याप्त समय नहीं देते। हालांकि स्पीकर का पक्ष यह रहता है कि वे केवल सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने की कोशिश करते हैं और नियमों के अनुसार ही निर्णय लेते हैं। असल प्रश्न केवल राहुल गांधी तक सीमित नहीं है। यह मुद्दा संसद में स्वस्थ बहस और संवाद की परंपरा से जुड़ा हुआ है। लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की आवाज जरूरी होती है। यदि विपक्ष को बोलने का अवसर नहीं मिलेगा तो सरकार की नीतियों की समीक्षा और आलोचना कैसे होगी? वहीं विपक्ष को भी अपनी बात जिम्मेदारी और तथ्यों के आधार पर रखनी चाहिए। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि संसद में असहमति की आवाज को दबाया न जाए, बल्कि उसे सुना जाए और उस पर तर्कपूर्ण बहस हो। यदि संसद संवाद का मंच बनेगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा, और यदि वहां केवल टकराव ही दिखाई देगा, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की सेहत के लिए अच्छा संकेत नहीं होगा। कानून से आगे, लोकतंत्र का संवाद मंच भारत की संसद केवल कानून बनाने की संस्था भर नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा का प्रतीक भी है। संसद वह मंच है जहाँ सत्ता और विपक्ष के बीच संवाद, बहस और जवाबदेही की प्रक्रिया चलती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहाँ जनता के प्रतिनिधि देश के विभिन्न मुद्दों पर खुलकर चर्चा करते हैं और सरकार से जवाब मांगते हैं। संसद का मुख्य कार्य कानून बनाना अवश्य है, लेकिन इसकी भूमिका इससे कहीं व्यापक है। यहाँ सरकार की नीतियों की समीक्षा होती है, जनता की समस्याएँ उठाई जाती हैं और देश की दिशा तय करने वाली बहसें होती हैं। जब सत्ता पक्ष अपनी नीतियों और निर्णयों को संसद के सामने रखता है, तो विपक्ष का दायित्व होता है कि वह उन पर सवाल उठाए, उनकी आलोचना करे और आवश्यक सुधारों की मांग करे। यही प्रक्रिया लोकतंत्र को मजबूत बनाती है। विपक्ष का मजबूत और सक्रिय होना लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। यदि संसद में केवल सत्ता पक्ष की आवाज़ ही सुनाई दे और विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर न मिले, तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। संसद में बहस और असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी ताकत होती है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में संसद के कामकाज में व्यवधान, हंगामा और राजनीतिक टकराव अधिक देखने को मिलते हैं। इससे न केवल संसद की गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर गंभीर चर्चा भी बाधित होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा करती है कि वे संसद को संघर्ष का नहीं, बल्कि समाधान का मंच बनाएं। आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझें। सरकार को विपक्ष की बात सुनने और संवाद की परंपरा को मजबूत करने का प्रयास करना चाहिए, वहीं विपक्ष को भी रचनात्मक आलोचना और सार्थक बहस के माध्यम से लोकतंत्र को सुदृढ़ बनाना चाहिए। संसद केवल कानून बनाने का स्थान नहीं, बल्कि लोकतंत्र की वह प्रयोगशाला है जहाँ विचारों का मंथन होता है और देश के भविष्य की दिशा तय होती है। यदि संसद में संवाद, बहस और जवाबदेही की संस्कृति मजबूत होगी, तभी लोकतंत्र भी सशक्त और जीवंत बना रहेगा। क्या अपनी बात रखने के लिए विपक्ष को अविश्वास मत लाना होगा? भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी संसद है, जहां सत्ता और विपक्ष दोनों को अपनी बात रखने, बहस करने और सरकार से जवाबदेही तय करने का अधिकार होता है। संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक संवाद का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम भी है। लेकिन यदि विपक्ष को अपनी बात रखने के लिए बार-बार अविश्वास प्रस्ताव का सहारा लेना पड़े, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाता है। अविश्वास प्रस्ताव का उद्देश्य सरकार की वैधता को चुनौती देना होता है। जब विपक्ष को लगता है कि सरकार ने जनता का भरोसा खो दिया है, तब वह संसद में अविश्वास मत लाता है। लेकिन यदि विपक्ष को केवल अपनी आवाज सुनाने के लिए ही इस कठोर संसदीय हथियार का इस्तेमाल करना पड़े, तो यह संसद की सामान्य कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि सरकार को जवाबदेह बनाना और जनहित के मुद्दों को उठाना भी है। यदि संसद में विपक्ष के नेताओं को बोलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता या उनकी बात को लगातार टाल दिया जाता है, तो इससे लोकतांत्रिक संवाद कमजोर होता है। संसद की गरिमा इस बात में है कि वहां असहमति को भी सम्मान के साथ सुना जाए। विपक्ष की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उसे केवल टकराव की राजनीति से आगे बढ़कर रचनात्मक बहस और ठोस सुझाव देने चाहिए। संसद का समय नारेबाजी और हंगामे में नष्ट करने के बजाय नीति और जनहित के मुद्दों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। इससे लोकतंत्र मजबूत होगा और जनता का भरोसा भी बना रहेगा। आज जरूरत इस बात की है कि संसद को टकराव का नहीं, बल्कि संवाद का मंच बनाया जाए। सरकार को विपक्ष की बात सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए और विपक्ष को भी जिम्मेदार भूमिका निभानी चाहिए। लोकतंत्र तब ही सशक्त होगा जब सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर संसद की गरिमा और संवाद की परंपरा को बनाए रखें। यदि स्थिति ऐसी बन जाए कि अपनी बात रखने के लिए विपक्ष को बार-बार अविश्वास मत का सहारा लेना पड़े, तो यह केवल सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र की विफलता मानी जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि संसद में संवाद, सहमति और स्वस्थ बहस की संस्कृति को पुन: मजबूत किया जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) ईएमएस / 12 मार्च 26