लेख
13-Mar-2026
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लोकतंत्र में संसद केवल बहस का मंच नहीं होती बल्कि वह देश की सामूहिक बुद्धि और जिम्मेदारी का प्रतीक भी होती है। यहा लिए गए निर्णय देश की दिशा तय करते हैं और यहां होने वाली चर्चाएं करोड़ों लोगों की उम्मीदों से जुड़ी होती हैं। इसलिए जब संसद में गंभीर विषयों पर विचार के बजाय लगातार हंगामा और टकराव देखने को मिलता है तो स्वाभाविक रूप से जनता के मन में निराशा पैदा होती है। हाल के दिनों में संसद के दोनों सदनों में जो स्थिति देखने को मिली उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीतिक दल वास्तव में राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर गंभीरता से चर्चा करना चाहते हैं या फिर संसद को केवल राजनीतिक रणनीति का मंच बना दिया गया है। सोमवार को संसद के सत्र में अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को लेकर विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया। विपक्ष की मांग थी कि इस अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के असर पर संसद में विस्तृत चर्चा कराई जाए। यह मांग अपने आप में गलत नहीं कही जा सकती क्योंकि मध्य पूर्व की घटनाओं का असर भारत सहित दुनिया के कई देशों पर पड़ सकता है। भारत के लाखों नागरिक खाड़ी देशों में काम करते हैं और तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में इस विषय पर चर्चा की मांग को पूरी तरह असंगत नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिस तरीके से विपक्ष ने इसे लेकर संसद की कार्यवाही बाधित की उसने इस मांग की गंभीरता पर ही सवाल खड़े कर दिए। लोकसभा में कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी सांसदों ने नारेबाजी और हंगामा शुरू कर दिया। स्थिति ऐसी बन गई कि महज कुछ ही मिनटों में सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। बाद में जब विदेश मंत्री Sसुभरमन्यम जयशंकर ने इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखने के लिए बयान देना शुरू किया तो भी विपक्ष ने विरोध जारी रखा। विपक्ष का कहना था कि मंत्री के बयान से पहले इस मुद्दे पर चर्चा कराई जानी चाहिए ताकि वे सरकार से सवाल पूछ सकें। दूसरी ओर सरकार का कहना था कि पहले मंत्री का वक्तव्य सुना जाए और उसके बाद चर्चा हो सकती है। इस टकराव के बीच सदन की कार्यवाही कई बार बाधित हुई और अंततः पूरे दिन कोई सार्थक चर्चा नहीं हो सकी। इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू सामने आया। विपक्ष ने पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था। संसदीय परंपरा के अनुसार जब ऐसा प्रस्ताव आता है तो उसे सदन में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि उस पर चर्चा हो सके। लेकिन जब सभापति जगदम्बिका पाल ने विपक्ष से प्रस्ताव पेश करने के लिए कहा तो विपक्ष ने ऐसा करने से परहेज किया और हंगामा जारी रखा। इससे यह संदेश गया कि विपक्ष स्वयं अपने प्रस्ताव को लेकर स्पष्ट नहीं है और उसकी प्राथमिकता वास्तविक बहस से अधिक राजनीतिक दबाव बनाना है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू ने भी इसी बात को उठाते हुए कहा कि विपक्ष खुद ही कंफ्यूज है कि वह करना क्या चाहता है। उनका तर्क था कि पहले स्पीकर के खिलाफ नोटिस दिया गया और फिर दूसरा मुद्दा उठाकर हंगामा किया जा रहा है। दूसरी ओर राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि मध्य पूर्व में तेजी से बदल रहे हालात का भारत पर असर पड़ रहा है इसलिए इस पर चर्चा जरूरी है। उनके अनुसार तेल की कीमतों में वृद्धि और खाड़ी देशों में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा जैसे मुद्दे गंभीर हैं और सरकार को इस पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। दरअसल यह सच है कि अंतरराष्ट्रीय संघर्षों का प्रभाव भारत पर पड़ सकता है। तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई पर असर पड़ता है और विदेशों में काम कर रहे भारतीयों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण चिंता होती है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अमेरिका और ईरान जैसे शक्तिशाली देशों के बीच चल रहे युद्ध को भारत अपने स्तर पर रोक नहीं सकता। भारत एक जिम्मेदार कूटनीतिक भूमिका जरूर निभा सकता है और शांति की अपील कर सकता है लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय युद्ध को रोक देना उसके हाथ में नहीं होता। ऐसे में इस विषय को लेकर संसद में लगातार हंगामा करना कहीं न कहीं राजनीतिक रणनीति अधिक और वास्तविक समाधान की कोशिश कम दिखाई देता है। संसद का समय अत्यंत मूल्यवान होता है। सभापति ने यह भी याद दिलाया कि संसद के हर मिनट पर लाखों रुपये खर्च होते हैं और यह पैसा अंततः जनता का ही होता है। जब संसद का समय हंगामे में नष्ट होता है तो उसका नुकसान केवल सरकार या विपक्ष को नहीं बल्कि पूरे देश को होता है। जनता अपने प्रतिनिधियों को इसलिए चुनकर भेजती है ताकि वे उनकी समस्याओं को उठाएं और समाधान के लिए ठोस चर्चा करें। लेकिन जब बहस के बजाय शोर और टकराव हावी हो जाता है तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होती है। आज देश के सामने अनेक गंभीर मुद्दे हैं जिन पर संसद में सार्थक चर्चा की आवश्यकता है। बेरोजगारी आर्थिक असमानता महंगाई कृषि संकट और शिक्षा स्वास्थ्य जैसी समस्याएं सीधे आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करती हैं। यदि विपक्ष इन मुद्दों को मजबूती से उठाए तो उसे जनता का व्यापक समर्थन मिल सकता है। इसी तरह सरकार की जिम्मेदारी भी है कि वह विपक्ष को चर्चा का पर्याप्त अवसर दे और लोकतांत्रिक संवाद की भावना को मजबूत करे। लोकतंत्र की सुंदरता इसी में है कि सत्ता और विपक्ष दोनों मिलकर राष्ट्रीय हित में काम करें। असहमति लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है लेकिन असहमति का अर्थ केवल विरोध करना नहीं बल्कि रचनात्मक बहस करना भी होता है। यदि संसद में हर मुद्दा केवल राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप और हंगामे का कारण बन जाएगा तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल अल्पकालिक राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर संसद की गरिमा को प्राथमिकता दें। अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर चर्चा जरूर होनी चाहिए लेकिन वह चर्चा तथ्य और तर्क पर आधारित होनी चाहिए न कि केवल राजनीतिक प्रदर्शन के रूप में। जब संसद में गंभीर बहस होगी तभी जनता का विश्वास मजबूत होगा और लोकतंत्र की वास्तविक भावना भी कायम रहेगी। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 13 मार्च /2026