15 मार्च 1901 को राजस्थान के चिड़ावा में हुआ था जन्म नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत में कुश्ती को सदियों से पारंपरिक खेल के रूप में देखा जाता रहा है। इस खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में कई महान पहलवानों और गुरुओं का योगदान रहा है। इन्हीं में एक प्रमुख नाम गुरु हनुमान का है, जिन्हें भारतीय कुश्ती के महान प्रशिक्षकों में गिना जाता है। उनका वास्तविक नाम विजय पाल यादव था और उनका जन्म 15 मार्च 1901 को राजस्थान के चिड़ावा में हुआ था। भले ही वह औपचारिक शिक्षा से दूर रहे, लेकिन बचपन से ही उनके मन में कुश्ती के प्रति गहरा जुनून था और इसी जुनून ने उन्हें आगे चलकर भारतीय कुश्ती का बड़ा स्तंभ बना दिया। कम उम्र से ही उन्होंने अखाड़ों में कुश्ती लड़ना शुरू कर दिया था। वर्ष 1919 में वह दिल्ली आए, जहां उन्होंने सब्जी मंडी क्षेत्र में बिड़ला मिल्स के पास एक छोटी दुकान खोली। हालांकि उनका मन व्यापार में नहीं लगा और उन्होंने अपना पूरा ध्यान कुश्ती की साधना में लगा दिया। धीरे-धीरे उनकी पहचान एक बेहतरीन पहलवान और प्रशिक्षक के रूप में बनने लगी। उन्होंने पारंपरिक भारतीय पहलवानी को अंतरराष्ट्रीय कुश्ती के मानकों के अनुरूप ढालने का काम किया और आधुनिक फ्रीस्टाइल कुश्ती की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गुरु हनुमान ने देश के कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवानों को प्रशिक्षण दिया। उनके शिष्यों में सुदेश कुमार और प्रेंमनाथ ने 1958 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का नाम रोशन किया। इसके अलावा सत्पाल सिंह और करतार सिंह ने क्रमशः 1982 और 1986 के एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल किए। उनके आठ शिष्यों को देश के प्रतिष्ठित अर्जुन अर्वाड से सम्मानित किया जा चुका है, जो उनके प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की सफलता का प्रमाण है। भारतीय उद्योगपति कृष्णकुमार बिरला ने उन्हें पुरानी दिल्ली के मलकागंज क्षेत्र में अखाड़ा स्थापित करने के लिए जमीन उपलब्ध कराई। इसी के बाद 1925 के आसपास ‘बिड़ला मिल्स व्यायामशाला’ की स्थापना हुई, जिसे बाद में गुरु हनुमान अखाड़ा के नाम से जाना जाने लगा। यह अखाड़ा दिल्ली के शक्ति नगर और रोशनआरा बाग क्षेत्र के पास स्थित है और इसे देश के सबसे पुराने सक्रिय कुश्ती प्रशिक्षण केंद्रों में गिना जाता है। इस अखाड़े से कई महान पहलवान तैयार हुए, जिनमें दारा सिंह, सुशील कुमार, सत्पाल सिंह और रवि दाहिया जैसे नाम शामिल हैं। यहां की मिट्टी को पहलवान बेहद शुभ मानते हैं और इसे भारतीय कुश्ती की परंपरा का प्रतीक माना जाता है। वर्ष 2014 में इस कुश्ती अकादमी को भारत सरकार ने राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए भी चुना था। गुरु हनुमान सादगीपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्ति थे और शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देते थे। 24 मई 1999 को हरिद्वार जाते समय मेरठ के पास एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। उन्हें 1983 में पदमश्री और 1987 में प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किया गया था। 9 अगस्त 2003 को दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने नई दिल्ली के कल्याण विहार स्पोर्ट्स स्टेडियम में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया, जो भारतीय कुश्ती में उनके अमूल्य योगदान की याद दिलाती है। डेविड/ईएमएस 14 मार्च 2026