क्षेत्रीय
18-Mar-2026
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- गवाह पेश न होने से बरी हुआ था आरोपी, अब फिर होगी सुनवाई - हाईकोर्ट ने आईजी को सौंपी जिम्मेदारी, 5 महीने में ट्रायल पूरा करने के निर्देश बिलासपुर (ईएमएस)। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी राशि के गबन से जुड़े एक अहम मामले में सख्त रुख अपनाते हुए आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि गंभीर अपराधों में केवल गवाह पेश न होने के आधार पर आरोपी को फायदा नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करना न्यायालय की जिम्मेदारी है। यह है पूरा मामला मामला सरगुजा जिले के अंबिकापुर से जुड़ा है, जहां पुलिस विभाग में पदस्थ आरक्षक सत्य प्रकाश भगत पर करीब 26.40 लाख रुपये की शासकीय राशि गबन करने का आरोप है। आरोप के मुताबिक, आरोपी ने वेतन शाखा में कार्यरत रहते हुए कंप्यूटर सिस्टम के जरिए अपने खाते और परिजनों के खातों में गलत तरीके से रकम ट्रांसफर करवाई। बताया गया कि आरोपी ने नक्सल भत्ता और राशन मनी जैसी छोटी रकम को बढ़ाकर हजारों-लाखों रुपये अपने खाते में डलवाए। इस तरह अलग-अलग अवधि में बड़ी रकम का गबन किया गया। गवाह नहीं आए, ट्रायल कोर्ट ने किया बरी मामले में वर्ष 2014 में अपराध दर्ज हुआ और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। हालांकि, करीब 28 अवसर दिए जाने के बावजूद अभियोजन एक भी गवाह पेश नहीं कर सका। समन, जमानती वारंट और गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद भी गवाह अदालत में पेश नहीं हुए। इस पर ट्रायल कोर्ट ने 2020 में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। अपील में फिर खुला मामला राज्य सरकार ने इस फैसले को सत्र न्यायालय में चुनौती दी। अपीलीय अदालत ने माना कि मामला गंभीर है और बिना गवाहों के ट्रायल अधूरा है। इसलिए केस को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेजते हुए अभियोजन को साक्ष्य पेश करने का एक और मौका देने का आदेश दिया गया। हाईकोर्ट ने अपील के फैसले को ठहराया सही आरोपी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की एकलपीठ ने अपीलीय अदालत के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय केवल मूकदर्शक नहीं हो सकता और यह सुनिश्चित करना उसकी जिम्मेदारी है कि ट्रायल निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से पूरा हो। आईजी को सौंपी जिम्मेदारी, तय समय में ट्रायल हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस महानिरीक्षक (आईजी), सरगुजा रेंज को गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी है। साथ ही ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि, हर महीने कम से कम दो तारीखें साक्ष्य के लिए तय हों। समन के बजाय सीधे जमानती वारंट जारी किए जाएं। गवाहों की उपस्थिति हर हाल में सुनिश्चित की जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पूरे मामले का ट्रायल 5 महीने के भीतर पूरा किया जाए। सिस्टम पर उठे सवाल हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इतने अवसर देने के बाद भी एक भी गवाह पेश न होना पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। ऐसे में यह जरूरी है कि जिम्मेदारी तय हो और ट्रायल को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ाया जाए। मनोज राज 18 मार्च 2026