लेख
19-Mar-2026
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काबुल की उस रात को शायद ही कोई भूल पाएगा जब आसमान से बरसती आग ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। रमजान का पवित्र महीना चल रहा था जब लोग इबादत और सब्र के साथ अपने दिन गुजार रहे थे। उसी समय अचानक लड़ाकू विमानों की गूंज ने पूरे शहर को दहशत में डाल दिया। कुछ ही पलों में जोरदार धमाकों ने एक बड़े नशा मुक्ति अस्पताल को मलबे में बदल दिया। जहां जिंदगी को बचाने की कोशिशें होती थीं वहीं अब मौत का सन्नाटा पसरा हुआ था। यह घटना केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ एक गहरी चोट बनकर सामने आई है। बताया जा रहा है कि इस हमले में सैकड़ों बेगुनाह लोगों की जान चली गई और बड़ी संख्या में लोग घायल हो गए। अस्पताल में उस समय हजारों मरीज मौजूद थे जो अपने जीवन को सुधारने की उम्मीद लेकर वहां आए थे। लेकिन किसे पता था कि वही जगह उनकी आखिरी मंजिल बन जाएगी। घायल लोगों की चीखें मलबे में दबे लोगों की मदद की पुकार और चारों तरफ फैली तबाही ने इस घटना को और भी भयावह बना दिया। यह दृश्य किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं था। तालिबान सरकार ने इस हमले को नरसंहार करार दिया है और कहा है कि यह सीधा हमला अफगानिस्तान की संप्रभुता पर है। उनके अनुसार यह हमला किसी भी मानवीय सिद्धांत के खिलाफ है और इसका जवाब दिया जाएगा। तालिबान के प्रवक्ता ने साफ शब्दों में कहा कि अब बातचीत और कूटनीति का समय खत्म हो चुका है। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि आने वाले समय में क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। जब संवाद के रास्ते बंद हो जाते हैं तब संघर्ष और भी गहरा हो जाता है। दूसरी ओर पाकिस्तान ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उनका निशाना केवल आतंकवादी ठिकाने थे। उनका दावा है कि उन्होंने उन स्थानों पर हमला किया जहां से उनके खिलाफ गतिविधियां संचालित हो रही थीं। लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि ऐसा था तो फिर एक अस्पताल कैसे निशाने पर आ गया। क्या यह खुफिया जानकारी की विफलता थी या फिर एक गंभीर लापरवाही। इन सवालों का जवाब अभी तक साफ नहीं है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा पीड़ा उन परिवारों को झेलनी पड़ रही है जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया। कई लोग अपने घर के कमाने वाले सदस्य को खो चुके हैं तो कई बच्चों के सिर से माता पिता का साया उठ गया है। मलबे में बिखरी दवाइयां टूटे हुए बिस्तर और जले हुए कपड़े इस बात के गवाह हैं कि यहां कभी जिंदगी बचाने की कोशिशें होती थीं। अब वही जगह मौत की कहानी सुना रही है। भारत ने भी इस हमले की कड़ी निंदा की है और इसे कायरतापूर्ण बताया है। भारत का कहना है कि निहत्थे नागरिकों पर हमला किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस मामले में कार्रवाई की मांग की गई है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इस घटना पर चिंता जताते हुए जांच की बात कही है। यह स्पष्ट है कि यह घटना केवल दो देशों के बीच का मामला नहीं रही बल्कि अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी है। इतिहास गवाह है कि युद्धों में भी कुछ नियम और मर्यादाएं होती थीं। अस्पतालों को हमेशा सुरक्षित स्थान माना जाता था। वहां घायल सैनिकों और आम नागरिकों का इलाज किया जाता था और उन्हें किसी भी हमले से बचाया जाता था। लेकिन आज के समय में यह मर्यादाएं टूटती नजर आ रही हैं। जब अस्पताल जैसे स्थान भी सुरक्षित नहीं रह जाते तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर युद्ध और आतंक के बीच की रेखा कहां रह गई है। इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम तकनीकी और सैन्य ताकत के घमंड में मानवता को भूलते जा रहे हैं। जब निर्दोष लोगों की जान जाती है तब कोई भी जीत असली जीत नहीं होती। यह केवल हार होती है इंसानियत की और नैतिक मूल्यों की। दुनिया को यह समझना होगा कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता। तालिबान द्वारा बदले की बात कहना भी चिंता का विषय है। यदि बदले की भावना हावी होती है तो यह संघर्ष और भी भयानक रूप ले सकता है। इसका असर केवल अफगानिस्तान और पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति और स्थिरता पर पड़ेगा। इसलिए जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आगे आए और इस मुद्दे का शांतिपूर्ण समाधान खोजने में मदद करे। इस हमले ने उन सभी लोगों के दिलों को झकझोर दिया है जो मानवता में विश्वास रखते हैं। एक अस्पताल का कब्रिस्तान में बदल जाना केवल एक घटना नहीं बल्कि एक चेतावनी है। यह चेतावनी है कि यदि हम समय रहते नहीं संभले तो आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और बढ़ सकती हैं। अंत में यही कहा जा सकता है कि युद्ध कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। यह केवल विनाश और पीड़ा लाता है। काबुल की यह त्रासदी हमें यह याद दिलाती है कि शांति ही एकमात्र रास्ता है जो मानवता को बचा सकता है। जरूरत है समझदारी की संवेदनशीलता की और उन मूल्यों को फिर से जीवित करने की जो हमें इंसान बनाते हैं। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 19 मार्च /2026