नई दिल्ली (ईएमएस)। ईरान से जुड़े मौजूदा तनाव का असर अब वैश्विक खाद बाजार पर साफ दिखने लगा है, जिसका सीधा प्रभाव भारतीय कृषि पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज में शिपमेंट बाधित होने से सल्फर, यूरिया और फॉस्फेट जैसे प्रमुख रसायनों की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, जिससे खाद की कीमतों में तेजी आ रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक वैश्विक खाद व्यापार का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में यदि स्थिति लंबी खिंचती है, तो सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। भारत के लिए चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि मार्च-अप्रैल के बीच खाद आयात का अहम समय होता है, जबकि मई से मक्का की बुवाई शुरू होती है, जो सबसे अधिक खाद पर निर्भर फसल है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक गैस की आपूर्ति घटने से नाइट्रोजन आधारित खादों के उत्पादन पर भी असर पड़ा है। वहीं खाड़ी देशों सऊदी अरब, कतर, ओमान और बहरीन से होने वाले निर्यात में गिरावट से बाजार पर अतिरिक्त दबाव बना है। यदि यह संकट एक महीने से अधिक चलता है, तो भारत में खाद के उपयोग में कमी आ सकती है, जिससे फसल उत्पादन और पैदावार प्रभावित होने का खतरा है। इसके साथ ही अल नीनो जैसी मौसमी परिस्थितियां स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं। हालांकि भारत रूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आयात बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन लंबे समय तक सप्लाई गैप को भर पाना मुश्किल होगा। ऐसे में खाद की बढ़ती कीमतें किसानों की लागत बढ़ाएंगी और मुनाफा घटा सकती हैं। विशेषज्ञों ने जैविक विकल्पों पर जोर देते हुए कहा है कि नाइट्रोजन फिक्सिंग माइक्रोब्स और बायो-स्टिमुलेंट्स के जरिए खाद पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकती है। फिलहाल वैश्विक हालात को देखते हुए भारतीय कृषि क्षेत्र के सामने नई चुनौतियां खड़ी होती नजर आ रही हैं।