हाईकोर्ट ने कम अटेंडेंस पर “ईयर डाउन” किए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज की इंदौर(ईएमएस)। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायाधीश जय कुमार पिल्लई की एकलपीठ ने एक एक याचिका पर सुनवाई के बाद दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि यूनिवर्सिटी के अकादमिक नियमों का पालन करना हर छात्र के लिए अनिवार्य है। न्यायालय ने कहा कि 75 फीसदी अटेंडेंस और यूनिट टेस्ट में उपस्थिति जैसे नियमों का उल्लंघन करने पर अदालत भी राहत नहीं देगा। न्यायालय ने मामले में सिम्बायसिस यूनिवर्सिटी आफ एप्लायड साइंस,, इंदौर के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें एक छात्र को “ईयर डाउन (वायडी)” घोषित किया गया था। सिम्बायसिस यूनिवर्सिटी आफ एप्लायड साइंस,, इंदौर के छात्र पार्थ सिंह राजावत ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर यूनिवर्सिटी के 30 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के जरिए यूनिवर्सिटी ने उसे “ईयर डाउन (वायडी)” घोषित कर दिया था। छात्र की मांग थी कि उसे बीबीए के चौथे सेमेस्टर में पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी जाए। छात्र का दावा था कि उसने वर्ष 2024 में यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया था और पहले वर्ष में 6.875 एसजीपीए हासिल किया लेकिन तीसरे सेमेस्टर में उसकी अटेंडेंस 30 फीसद से नीचे चली गई, जो कि यूनिवर्सिटी के 75 फीसदी अनिवार्य नियम से काफी कम थी। यूनिवर्सिटी ने उसे सुधार का मौका देते हुए रीमेडियल क्लासेस अटेंड करने को कहा, लेकिन इसके बावजूद छात्र यूनिट टेस्ट में नियमित रूप से उपस्थित नहीं हो पाया। इस पर 14 नवंबर 2025 को यूनिवर्सिटी ने छात्र का एडमिशन रद्द कर दिया। इसके खिलाफ छात्र ने 24 नवंबर को आवेदन दिया, लेकिन कोई निर्णय नहीं हुआ जिसपर छात्र याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय की शरण ली।। छात्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने 14 दिसंबर 2025 को अंतरिम आदेश के तहत उसे तीसरे सेमेस्टर की परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी थी। इसके बाद छात्र ने परीक्षा तो दे दी, लेकिन यूनिवर्सिटी ने रिजल्ट घोषित करने से पहले ही उसे “ईयर डाउन” घोषित कर दिया। इसी आदेश को छात्र ने फिर से उच्च न्यायालय में चुनौती दी। जिसपर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने अपने फैसले में साफ कहा कि यूनिवर्सिटी के नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। अगली क्लास में प्रमोशन के लिए दो शर्तें जरूरी हैं पहली - कम से कम 75 फीसदी अटेंडेंस और दूसरी- सभी यूनिट टेस्ट में भाग लेना और पास होना। न्यायालय ने पाया कि छात्र केवल 30 फीसद से कम अटेंडेंस रखता था। पहले और दूसरे यूनिट टेस्ट, दोनों में वह अनुपस्थित रहा। यानी उसने दोनों ही जरूरी शर्तों का उल्लंघन किया। एकलपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि “सिर्फ परीक्षा में बैठने की अनुमति देने से छात्र की अकादमिक कमियां खत्म नहीं हो जातीं।” यानि,अंतरिम आदेश के आधार पर छात्र स्थायी राहत की उम्मीद नहीं कर सकता। यूनिवर्सिटी ने जो निर्णय लिया, वह पूरी तरह से नियमों के अनुसार है और इसमें कोई मनमानी नहीं है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं हुआ है। इस मत के साथ न्यायालय ने छात्र की याचिका खारिज कर दी । ईएमएस, १९ मार्च, २०२६