अन्विता गांव में पली-बढ़ी थी। दसवीं कक्षा तक उसने गांव के ही सरकारी विद्यालय में पढ़ाई की थी। गांव का वातावरण उसके लिए केवल रहने का स्थान नहीं था, बल्कि जीवन की एक मधुर अनुभूति था। चारों ओर खुला आसमान, स्वच्छ हवा, खेतों की हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट-यही उसकी दुनिया थी।उसका घर भी गांव की उसी सादगी और प्रकृति के सौंदर्य से भरा हुआ था। घर का आंगन बहुत बड़ा और खुला था, जैसा कि आमतौर पर गांवों में होता है। आंगन के सामने दो-तीन खेजड़ी के पेड़ खड़े रहते, जिनकी छाया में अक्सर गाय और भैंस बंधी रहतीं थीं। पास ही एक सुंदर गुलमोहर का भी पेड़ था, जो गर्मियों में लाल फूलों से लद जाता था। दाड़िम और नींबू के पेड़ भी घर के आसपास लगे हुए थे। इन पेड़ों पर दिनभर पक्षियों का मेला लगा रहता।अन्विता के पिताजी खेती करते थे और घर में एक गाय व एक भैंस भी रखते थे। शाम को जब वे खेतों से लौटते तो ढोरों के लिए हरा-चारा साथ लेकर आते। उस समय पूरे घर में एक अलग ही सुकून भरा माहौल बन जाता। गर्मियों के दिनों में खुले आंगन में कूलर और पंखा लगाकर सोना, तारों भरे आकाश को निहारना और ठंडी हवा का आनंद लेना-ये सब अन्विता के बचपन की अनमोल यादें थीं। वहां न मच्छरों की समस्या थी, न ही मक्खियों का कोई झंझट।घर के आंगन में एक तरफ पक्षियों के लिए एक छोटा-सा चबूतरा भी बना हुआ था। यह चबूतरा जैसे पक्षियों का भोजनालय था। कभी उसके पिताजी, कभी माताजी और कई बार स्वयं अन्विता वहां पक्षियों के लिए दाना और पानी रखती थी। सुबह होते ही उस चबूतरे पर पक्षियों का मेला लग जाता। तोते, मैना, कबूतर, गौरैया, कौए और कई बार मोर भी वहां आ जाते।अन्विता और उसके माता-पिता सुबह-सुबह चाय पीते, अखबार पढ़ने हुए आधा घंटा, कभी-कभी तो उससे भी ज्यादा समय तक चबूतरे पर पक्षियों की अठखेलियां देखते रहते। पक्षियों की चहचहाहट से घर का वातावरण जीवंत हो उठता। ऐसा लगता मानो प्रकृति स्वयं आकर उनके आंगन में बस गई हो।घर में तीन पक्के कमरे थे और पशुओं के लिए दो कच्चे मकान बने हुए थे। उन कच्चे मकानों की दीवारों और छतों में गौरैयों ने अपने स्थायी घोंसले बना लिए थे। धीरे-धीरे अन्विता का घर सचमुच गौरैयों का घर बन गया था। अन्विता स्वयं पक्षी प्रेमी थी। उसे विशेष रूप से गौरैया से बहुत लगाव था। इतना लगाव कि उसने अपने घर के चौबारे में आठ-दस छोटे-बड़े घोंसले बना दिए थे, ताकि गौरैया सुरक्षित रह सकें। सुबह और शाम सैकड़ों गौरैया वहां आती-जाती दिखाई देतीं। उनकी चहचहाहट से पूरा घर गूंज उठता। कई गौरैया तो इतनी अभ्यस्त हो गई थीं कि वे अन्विता से डरती भी नहीं थीं। जब वह दाना डालती तो वे उसके बिल्कुल पास आकर चुगने लगतीं। कभी खाना खाते समय उसके पिताजी और कभी स्वयं अन्विता रोटी का एक छोटा-सा टुकड़ा गौरैयों की ओर फेंक देती। वह दृश्य अन्विता को अत्यंत प्रिय था। उसे लगता जैसे ये नन्हीं चिड़ियां उसकी सच्ची सहेलियां हों।समय के साथ पढ़ाई आगे बढ़ी और बारहवीं कक्षा के लिए अन्विता को शहर जाना पड़ा। वहां उसे एक छात्रावास में रहना पड़ा। यह उसके जीवन का पहला अवसर था जब वह गांव से दूर रह रही थी। शहर का वातावरण उसके लिए बिल्कुल अलग था। ऊंची-ऊंची इमारतें, भीड़भाड़, वाहनों का शोर और धुएं से भरी हवा। छात्रावास भी पुराना था और उसमें लगभग डेढ़-दो सौ लड़कियां रहती थीं। शुरू-शुरू में अन्विता का मन वहां पर बिल्कुल भी नहीं लगता था। उसे गांव की हर चीज याद आती-खुला आंगन, पेड़ों की छाया, माता-पिता का स्नेह और सबसे बढ़कर गौरैयों की चहचहाहट। छात्रावास में न तो वह खुलापन था और न ही गांव घर वाली सी पक्षियों की वह मधुर और सुंदर दुनिया। छात्रावास की अधिकांश लड़कियां गौरैया और अन्य पक्षियों से परेशान रहती थीं। उन्हें लगता कि पक्षी शोर करते हैं और जगह-जगह गंदगी फैला देते हैं। जब भी कोई गौरैया खिड़की या बरामदे में आ जाती, लड़कियां उन्हें भगाने लगतीं। अन्विता को यह सब अच्छा नहीं लगता था। अन्विता के लिए यह दृश्य बिल्कुल अलग ही था। वह जब भी किसी गौरैया को देखती, उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती। उसे अपने गांव की यादें घेर लेतीं। एक दिन उसने पुस्तक में पढ़ा कि गौरैया की संख्या तेजी से घट रही है और यह पक्षी संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल हो चुका है। यह पढ़कर वह बहुत चिंतित हो गई। उसके मन में विचार आया कि यदि समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो कहीं ऐसा न हो कि जैसे गिद्ध लगभग विलुप्त हो गए, वैसे ही गौरैया भी गायब हो जाए।उसी दिन उसने अपने मन में एक संकल्प लिया-गौरैया को बचाने के लिए वह कुछ न कुछ अवश्य करेगी। उसने अपनी एक अध्यापिका से इस विषय पर गहन चर्चा की। अध्यापिका ने उसके विचारों की सराहना की और उसे एक सामाजिक संस्था (एनजीओ) से संपर्क करने की सलाह दी। उस संस्था के लोग पक्षियों के संरक्षण के लिए काफ़ी समय से काम कर रहे थे। अन्विता ने अपने छात्रावास से ही इस अभियान की शुरुआत की। उसने छात्राओं को समझाया कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं है, बल्कि हमारे पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। धीरे-धीरे कुछ छात्राएं उसकी बातों से प्रभावित होने लगीं।उसने छात्रावास के परिसर में छोटे-छोटे घोंसले लगवाए और पानी के पात्र भी रखवाए। हास्टल वार्डन और अध्यापिका की सहायता से शहर के भामाशाहों और दानदाताओं से संपर्क कर उसने और भी घोंसले और दाना-पानी के पात्र(पानी के परिंडे व चुग्गा-पात्र) बनवाए। शहर के कई पार्कों, विद्यालयों और घरों में भी यह अभियान फैलने लगा। कुछ ही महीनों में परिणाम दिखाई देने लगे। जहां पहले बहुत कम गौरैया दिखाई देती थीं, वहां अब फिर से उनकी चहचहाहट सुनाई देने लगी। जब भी कोई गौरैया घोंसले में आती-जाती दिखती, अन्विता के चेहरे पर वही बचपन वाली खुशी लौट आती। उसे लगता जैसे उसने अपने गांव का एक छोटा-सा हिस्सा शहर में फिर से बसा दिया हो। अब लोग उसे प्रेम से गौरैया वाली अन्विता कहने लगे थे। अन्विता को इससे बड़ी कोई खुशी नहीं थी। उसे विश्वास था कि यदि हर व्यक्ति प्रकृति और पक्षियों के प्रति थोड़ा-सा प्रेम और जिम्मेदारी दिखाए, तो धरती हमेशा चहचहाती रहेगी। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार उत्तराखंड, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 20 मार्च 26