पटना(ईएमएस)। राजनीतिक सक्रियता और दांव-पेच सीखने के लिए बिहार से बेहतर कोई अध्ययन केंद्र नहीं हो सकता। आजादी के आंदोलन से लेकर 1974 के जेपी मूवमेंट तक, बिहार हमेशा वैचारिक क्रांतियों की उर्वर भूमि रहा है। 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने एम-वाय (मुस्लिम-यादव) समीकरण और अगड़े-पिछड़े की राजनीति के जरिए सत्ता पर 15 साल तक कब्जा जमाए रखा। लेकिन जब शासन की विफलताओं के कारण सत्ता नीतीश कुमार के पास आई, तो विमर्श अपहरण उद्योग से बदलकर सुशासन और विकास पर टिक गया। आज एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन इस बार चर्चा उनके विकास कार्यों की नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक स्थिरता और भविष्य के कदमों की हो रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि नीतीश कुमार अब पहले जैसे निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहे और भाजपा ने उन्हें हाईजैक कर लिया है। विपक्ष के पास अपने तर्क हैं—जैसे गृह विभाग का प्रभार भाजपा के सम्राट चौधरी को सौंपना और सदन में उनके कुछ विवादित बयान। ताजा विवाद का मुख्य कारण नीतीश कुमार का राज्यसभा चुनाव है। अपने लंबे करियर में लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्य रह चुके नीतीश ने राज्यसभा जाने की इच्छा जताई और निर्वाचित भी हुए। नियमानुसार, उन्हें 16 मार्च के निर्वाचन के 14 दिनों के भीतर (30 मार्च तक) विधान परिषद या राज्यसभा में से किसी एक की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा। यदि वे विधान परिषद नहीं छोड़ते, तो उनकी राज्यसभा सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाएगी। इसी तकनीकी और राजनीतिक पेंच ने देश भर में कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। नीतीश कुमार पर संदेह की सबसे बड़ी वजह उनका अतीत है। मरते दम तक साथ न जाने की कसम खाने के बाद भी भाजपा के साथ आना और फिर अलग होकर राजद से हाथ मिलाना, उनके राजनीतिक चरित्र का हिस्सा रहा है। हालांकि, भाजपा ने हमेशा उनका सम्मान किया है—चाहे 2020 में कम सीटें होने के बावजूद उन्हें सीएम बनाना हो या 2019 के लोकसभा चुनाव में बराबरी का दर्जा देना। नीतीश भले ही कह रहे हों कि वे अब कहीं नहीं जाएंगे, लेकिन उनके पुराने खेल को देखते हुए सियासी गलियारों में आज भी ऑल इज वेल पर यकीन करना मुश्किल हो रहा है। वीरेंद्र/ईएमएस/20मार्च2026