नई दिल्ली (ईएमएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड के दोषी संतोष कुमार सिंह को तुरंत आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया है। यह आदेश संतोष की समय पूर्व रिहाई की याचिका के बाद आया, जिसे प्रियदर्शिनी के भाई ने चुनौती दी थी। 1996 के इस जघन्य अपराध में संतोष को पहले बरी किया गया, फिर दोषी ठहराया गया। 23 जनवरी 1996 की वह सर्द 20 मार्च सुबह भी दिल्ली के वसंत कुंज इलाके की उन दीवारों में कैद है, जिन्होंने एक ऐसी हैवानियत देखी थी, जिसने पूरे देश की रूह कंपा दी थी। 30 साल बाद, 20 मार्च 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले में एक नया और बड़ा आदेश जारी किया है। अदालत ने दोषी संतोष कुमार सिंह को तुरंत आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। यह आदेश प्रियदर्शिनी के भाई याचिका के बाद आया है, यह याचिका हत्या आरोपित संतोष कुमार सिंह ने दायर की थी, जिसमें उसने अपनी समय पूर्व रिहाई की गुहार लगाई थी। आइए जानते हैं सनक और जुनून की की एक कहानी को, जिसने एक होनहार बेटी को हमसे छीन लिया। मूल रूप से कश्मीरी पंडित समुदाय से ताल्लुक रखने वाली प्रियदर्शिनी मट्टू का परिवार घाटी में उग्रवाद के चलते अपना घर छोड़कर जम्मू आ बसा था। श्रीनगर के प्रेजेंटेशन कॉन्वेंट स्कूल से शुरुआती शिक्षा और जम्मू से बी.कॉम करने के बाद, प्रियदर्शिनी कानून की पढ़ाई (लाॅ) करने दिल्ली यूनिवर्सिटी आईं। उन्हें क्या पता था कि यहां उनका सामना एक ऐसी सनक से होगा जो मौत बनकर उनका पीछा करेगी। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/20/मार्च/2026