राष्ट्रीय
22-Mar-2026
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नई दिल्ली(ईएमएस)। हिमालय, जिसे पूरी दुनिया एशिया के ‘वॉटर टावर’ के रूप में जानती है, आज एक गंभीर अस्तित्वगत संकट से जूझ रहा है। हालिया वैज्ञानिक रिपोर्टों और अध्ययनों से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि हिमालय के ग्लेशियर अब पहले की तुलना में दोगुनी रफ्तार से पिघल रहे हैं। यह स्थिति न केवल पर्यावरण के लिए चेतावनी है, बल्कि गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी जीवनदायिनी नदियों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि पिघलने की यही गति जारी रही, तो आने वाले दशकों में करोड़ों लोगों के सामने पानी का भीषण संकट खड़ा हो सकता है। आंकड़ों के अनुसार, हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर बहुत तेजी से सिकुड़ रहे हैं। वर्ष 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियर क्षेत्र का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा विलुप्त हो चुका है, जबकि बर्फ के कुल भंडार में 9 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि 21वीं सदी में बर्फ पिघलने की दर 20वीं सदी के मुकाबले दोगुनी हो गई है। विशेष रूप से 2010 के बाद से इस गिरावट में अप्रत्याशित तेजी आई है, जिससे छोटे ग्लेशियर पूरी तरह गायब होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इस पिघलते स्वरूप का सबसे भयावह प्रभाव गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन पर देखने को मिल रहा है। पिछले तीन दशकों में इन क्षेत्रों में ग्लेशियरों का क्रमशः 21 प्रतिशत और 16 प्रतिशत हिस्सा कम हुआ है। ये नदियां भारत और पड़ोसी देशों की एक विशाल आबादी की प्यास बुझाती हैं और कृषि व अर्थव्यवस्था का आधार हैं। ग्लेशियरों के सिकुड़ने से सूखे के मौसम में इन नदियों का जलस्तर काफी गिर सकता है, जिससे खेती और बिजली उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में स्थित लगभग 63,000 ग्लेशियर प्राकृतिक जल भंडार का कार्य करते हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान और वर्षा के बदलते चक्र ने इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। शोध बताते हैं कि 5500 मीटर से कम ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं। साथ ही, दक्षिण और पूर्व दिशा की ओर ढलान वाले ग्लेशियर सीधी धूप के संपर्क में आने के कारण तेजी से खत्म हो रहे हैं। यह केवल बर्फ का पिघलना नहीं है, बल्कि एक वैश्विक आपदा की आहट है जिसे समय रहते रोकने के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। वीरेंद्र/ईएमएस/22मार्च2026