23 मार्च भगत सिंह बलिदान दिवस) प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धांजलि देने के लिये शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलां है जो पंजाब, भारत में है। उनके जन्म के समय उनके पिता किशन सिंह, चाचा अजित और स्वरण सिंह जेल में थे।भगत सिंह को भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारियों में से एक माना जाता है। वो कई क्रन्तिकारी संगठनों के साथ मिले और उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया था। जिनकी शिक्षाएँ भारत के लोगों को प्रेरित करती हैं। उनकी जयंती राष्ट्रीय नायक के रूप में मनाई जाती है, जिन्होंने साहस और बलिदान के साथ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध देश की आज़ादी के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया था। भगत सिंह कौन थे? जन्म: भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को बंगा, पंजाब, ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वे एक सिख परिवार से थे जो उपनिवेशवाद विरोधी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थे, उनके पिता किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। प्रारंभिक जीवन: जब वह बारह वर्ष के थे, तब उन्होंने जलियाँवाला बाग में हुए नरसंहार को देखा, जिससे उनमें देशभक्ति की भावना प्रबल हुई और उन्हें भारत की स्वतंत्रता के लिये लड़ने की प्रेरणा मिली। शिक्षा: उन्होंने लाहौर में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नेशनल कॉलेज में दाखिला लिया, जिसने स्वदेशी आंदोलन को बल मिलने के साथ क्रांतिकारी विचारों के प्रसार हेतु एक मंच प्राप्त हुआ। क्रांतिकारी संगठन: भगत सिंह वर्ष 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सदस्य बने, बाद में वर्ष 1928 में इसका नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया गया। नौजवान भारत सभा की स्थापना वर्ष 1926 में भगत सिंह ने की थी, जिसका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के लिये युवाओं को संगठित करना था। प्रमुख कार्य: भगत सिंह पुलिस की बर्बरता के कारण लाला लाजपत राय की मृत्यु के प्रतिशोध के रूप में वर्ष 1928 में पुलिस अधिकारी जेपी सॉन्डर्स की हत्या (लाहौर षडयंत्र केस) में शामिल थे। उन्होंने 18 अप्रैल, 1929 को बी.के. दत्त के साथ मिलकर दमनकारी ब्रिटिश कानूनों के विरोध में केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका। गिरफ्तारी और मुकदमा: वर्ष 1929 में उन्हें बम कांड के लिये गिरफ्तार किया गया साथ ही लाहौर षडयंत्र मामले में हत्या के आरोप मे उन पर मुकदमा चला, जिसमे उन्हें दोषी ठहराया गया तथा मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। 23 मार्च, 1931 को साथी क्रांतिकारी सुखदेव और राजगुरु के साथ लाहौर में उन्हें फाँसी दे दी गई। भगत सिंह को शहीद-ए-आज़म के नाम से जाना जाता है। साहित्यिक योगदान: उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में मैं नास्तिक क्यों हूँ, जेल डायरी’ और अन्य कृतियाँ, समाजवाद तथा क्रांति का समर्थन करने वाले कई राजनीतिक घोषणा-पत्र शामिल हैं। अपनी प्रारंभिक रचना विश्व प्रेम में भगत सिंह ने समानता के महत्त्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने भूख और युद्ध से मुक्त एक ऐसे विश्व की परिकल्पना की, जो मानव जाति और राष्ट्रीयता की सीमाओं से परे हो। विचारधाराएँ: उन्होंने मार्क्सवादी और समाजवादी विचारधाराओं का समर्थन किया, तर्कवाद, समानता और न्याय पर ज़ोर दिया। संगठित धर्म, जिसे मानसिक एवं शारीरिक गुलामी के रूप में देखा जाता था, की आलोचना की। विरासत: भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान को याद करने के लिये प्रत्येक वर्ष उनके जन्मदिन और उनकी फाँसी के दिन को याद किया जाता है। उन्हें एक राष्ट्रीय नायक और शहीद के रूप में जाना जाता है। उन्हें 1906 में लागू किये हुए औपनिवेशीकरण विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करने के जुल्म में जेल में डाल दिया गया था। उनकी माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह का परिवार एक आर्य-समाजी सिख परिवार था। भगत सिंह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अत्याधिक प्रभावित रहे। उनके एक चाचा, सरदार अजित सिंह ने भारतीय देशभक्त संघ की स्थापना की थी। उनके एक मित्र सैयद हैदर रजा ने उनका अच्छा समर्थन किया और चिनाब नहर कॉलोनी बिल के खिलाफ किसानों को आयोजित किया। अजित सिंह के खिलाफ 22 मामले दर्ज हो चुके थे जिसके कारण वो ईरान पलायन के लिए मजबूर हो गए। उनके परिवार ग़दर पार्टी के समर्थक थे और इसी कारण से बचपन से ही भगत सिंह के दिल में देश भक्ति की भावना उत्पन्न हो गयी। भगत सिंह ने अपनी 5वीं तक की पढाई गांव में की और उसके बाद उनके पिता किशन सिंह ने दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल, लाहौर में उनका दाखिला करवाया। बहुत ही छोटी उम्र में भगत सिंह, महात्मा गांधी जी के असहयोग आन्दोलन से जुड़ गए और बहुत ही बहादुरी से उन्होंने ब्रिटिश सेना को ललकारा।जलियांवाला कांड ने डाला भगत के बाल मन पर प्रभाव डाला.13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। उनका मन इस अमानवीय कृत्य को देख देश को स्वतंत्र करवाने की सोचने लगा। भगत सिंह ने चंद्रशेखर आज़ाद के साथ मिलकर क्रांतिकारी संगठन तैयार किया। लाहौर षड़यंत्र मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सज़ा सुनाई गई और बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया। भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे सुखदेव और राजगुरू के साथ फांसी पर लटका दिया गया। तीनों ने हंसते-हँसते देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दियाभगत सिंह जी की मृत्यु 23 वर्ष की आयु में हुई जब उन्हें ब्रिटिश सरकार ने फांसी पर चढ़ा दिया।ऐसे वीर शहीद को शत शत नमन! (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 22 मार्च /2026