23 मार्च बलिदान दिवस पर विशेष) भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिकारी, अद्वितीय साहस और अद्भुत देशभक्ति के प्रतीक थे। उनका जीवन केवल 23 वर्षों का था, लेकिन इस अल्प आयु में उन्होंने जो कार्य किए, वे सदियों तक देशवासियों को प्रेरित करते रहेंगे। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में) के बंगा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। उनके परिवार में देशभक्ति का माहौल था, जिससे उनके मन में बचपन से ही देशप्रेम की भावना विकसित हुई। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे। यही कारण था कि भगत सिंह बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचारों को समझने लगे थे। 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। इस घटना के बाद उन्होंने निश्चय कर लिया कि वे देश को स्वतंत्र कराने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देंगे।भगत सिंह ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा लाहौर में प्राप्त की। वे पढ़ाई में तेज थे और इतिहास तथा राजनीति में विशेष रुचि रखते थे। महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने भाग लिया, लेकिन जब 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद आंदोलन वापस ले लिया गया, तो वे निराश हुए और उन्होंने क्रांतिकारी मार्ग अपनाने का निर्णय लिया। भगत सिंह ने कई क्रांतिकारी संगठनों के साथ मिलकर कार्य किया। वे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रमुख सदस्य थे। उनका उद्देश्य केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना ही नहीं, बल्कि एक समाजवादी और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना करना भी था। 1928 में जब ब्रिटिश सरकार ने साइमन कमीशन भारत भेजा, तो पूरे देश में इसका विरोध हुआ। इस विरोध प्रदर्शन में लाला लाजपत राय पर अंग्रेज पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट के आदेश पर लाठीचार्ज किया गया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके साथियों ने पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। इसके बाद भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका। उनका उद्देश्य किसी को मारना नहीं था, बल्कि अंग्रेजों को यह संदेश देना था कि भारतीय अब चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने बम फेंकने के बाद “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगाए और स्वयं को गिरफ्तार करवा दिया। जेल में रहते हुए भगत सिंह ने कैदियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल की। उन्होंने यह मांग की कि भारतीय कैदियों के साथ भी वही व्यवहार किया जाए, जो अंग्रेज कैदियों के साथ किया जाता है। उनकी यह हड़ताल कई दिनों तक चली और पूरे देश में उनके समर्थन में आवाजें उठीं।। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की मित्रता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रेरणादायक और ऐतिहासिक मित्रताओं में से एक मानी जाती है। यह मित्रता केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं थी, बल्कि एक साझा लक्ष्य(देश की आज़ादीआधारित थी) इन तीनों की मुलाकात क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान हुई। वे सभी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य थे। संगठन में काम करते हुए उनके विचार, उद्देश्य और देशभक्ति की भावना एक-दूसरे से गहराई से जुड़ गई। धीरे-धीरे यह संबंध सच्ची मित्रता में बदल गया। तीनों ही युवाओं का मानना था कि केवल शांतिपूर्ण तरीकों से अंग्रेजों को भारत से बाहर नहीं किया जा सकता। वे क्रांतिकारी मार्ग को आवश्यक समझते थे। देश के लिए कुछ बड़ा करने का जुनून, अन्याय के खिलाफ विद्रोह और स्वतंत्रता की तीव्र इच्छा—इन सबने उनकी मित्रता को और मजबूत बनाया। भगत सिंह विचारों के धनी, लेखक और दूरदर्शी नेता थे तो सुखदेव संगठनकर्ता और रणनीतिक सोच वाले क्रांतिकारी थे जबकि राजगुरु साहसी और निर्भीक योद्धा थे। इन तीनों की अलग-अलग विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरक बनाती थीं। 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद, इन तीनों ने मिलकर बदला लेने की योजना बनाई। इसी के तहत ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की गई। यह घटना उनकी मित्रता और एकजुटता का सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ उन्होंने मिलकर एक बड़े मिशन को अंजाम दिया। इनकी मित्रता का सबसे मजबूत पक्ष था—अटूट विश्वास। उन्होंने कभी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा। जब वे गिरफ्तार हुए, तब भी उन्होंने अपने साथियों के खिलाफ कोई बयान नहीं दिया। उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए हँसते-हँसते फांसी स्वीकार कर ली। 23 मार्च 1931 को, इन तीनों को एक साथ फांसी दी गई। यह दिन आज “शहीद दिवस” के रूप में मनाया जाता है। उनकी शहादत ने यह साबित कर दिया कि उनकी मित्रता केवल जीवन तक सीमित नहीं थी, बल्कि मृत्यु तक अटूट बनी रही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की मित्रता आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा है। भगत सिंह का अदालत में दिया गया बयान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बयान उन्होंने 1929 में दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद अदालत में पेश होकर दिया था। इस बयान में उन्होंने अपने कार्यों के पीछे की सोच, उद्देश्य और क्रांतिकारी विचारधारा को स्पष्ट किया। भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में कहा:“हमने बम फेंका, लेकिन हमारा उद्देश्य किसी को मारना नहीं था। हम केवल बहरी सरकार को सुनाना चाहते थे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि बम जानबूझकर ऐसी जगह फेंका गया जहाँ किसी की जान न जाए। उनका उद्देश्य हिंसा फैलाना नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाना था। भगत सिंह ने अदालत में “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे का अर्थ समझाते हुए कहा कि इसका मतलब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समाज में अन्याय, शोषण और असमानता को समाप्त करना है। उन्होंने कहा: “क्रांति से हमारा मतलब यह नहीं है कि खून-खराबा हो, बल्कि यह है कि समाज की वर्तमान व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया जाए।” उनके अनुसार क्रांति का उद्देश्य एक न्यायपूर्ण और समानता आधारित समाज बनाना था। भगत सिंह ने अदालत में ब्रिटिश सरकार की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों का शासन भारतीयों का शोषण कर रहा है और जनता के अधिकारों को दबा रहा है। उन्होंने बताया कि वे भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने जानबूझकर आत्मसमर्पण किया ताकि वे अदालत को एक मंच बनाकर अपने विचार पूरे देश तक पहुंचा सकें। भगत सिंह का बयान केवल एक कानूनी बचाव नहीं था, बल्कि यह युवाओं के लिए एक संदेश भी था कि वे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं और देश के लिए समर्पित रहें। भगत सिंह के इस बयान ने पूरे देश में नई चेतना पैदा कर दी। उनके विचार तेजी से फैलने लगे और वे युवाओं के आदर्श बन गए। अदालत का यह मंच उनके लिए एक क्रांतिकारी विचारधारा को जनता तक पहुँचाने का माध्यम बन गया।। भगत सिंह और भगवती चरण बोहरा का संबंध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गहरी मित्रता, वैचारिक एकता और क्रांतिकारी सहयोग का प्रतीक है। दोनों ने मिलकर न केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया, बल्कि एक संगठित क्रांतिकारी आंदोलन को दिशा भी दी। भगवती चरण बोहरा, भगत सिंह के अत्यंत करीबी सहयोगी और मित्र थे। वे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख सदस्यों में से एक थे। भगत सिंह जहाँ एक विचारक और प्रेरक नेता थे वहीं बोहरा संगठन के रणनीतिकार और योजनाकार थे दोनों की यह साझेदारी आंदोलन की ताकत बनी भगवती चरण बोहरा ने “बम का दर्शन (Philosophy of the Bomb)” नामक प्रसिद्ध लेख लिखा, जो क्रांतिकारी विचारधारा को स्पष्ट करता है और जिसे भगत सिंह के विचारों से भी जोड़ा जाता है। दोनों ही क्रांतिकारी केवल स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि एक समानता और न्याय पर आधारित समाज की स्थापना चाहते थे वे समाजवाद के समर्थक थे शोषण और अन्याय के खिलाफ थे युवाओं में जागरूकता फैलाना चाहते थे भगत सिंह और भगवती चरण बोहरा के बीच गहरा विश्वास था। वे एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते थे कठिन परिस्थितियों में भी एक-दूसरे का साथ देते थे,भगवती चरण बोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी भी इस क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय थीं और भगत सिंह की सहायता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1930 में बम परीक्षण के दौरान भगवती चरण बोहरा की मृत्यु हो गई। यह घटना क्रांतिकारी आंदोलन के लिए बड़ा आघात थी भगत सिंह को इससे गहरा दुख हुआ इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा और उनके विचार जीवित रहे। भगत सिंह और चन्द्र शेखर आज़ाद का संबंध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गुरु-शिष्य, साथी और क्रांतिकारी सहयोग का अद्भुत उदाहरण है। दोनों ने मिलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशक्त और संगठित क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा किया भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद की मुलाकात क्रांतिकारी गतिविधियों के दौरान हुई आज़ाद उस समय अनुभवी और वरिष्ठ क्रांतिकारी थे भगत सिंह युवा, उत्साही और विचारशील क्रांतिकारी थे धीरे-धीरे यह संबंध गहरे विश्वास और सम्मान में बदल गया। दोनों हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) के प्रमुख स्तंभ थे। चन्द्रशेखर आज़ाद संगठन के नेता और मार्गदर्शक थे भगत सिंह: विचारक, योजनाकार और प्रेरक दोनों ने मिलकर संगठन को नई दिशा और शक्ति दी सॉन्डर्स वध (1928) लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए की गई इस कार्रवाई में दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। योजना में भगत सिंह शामिल थे आज़ाद ने पूरे ऑपरेशन को सुरक्षा और नेतृत्व दिया हालांकि बम फेंकने का कार्य भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने किया, लेकिन इसके पीछे आज़ाद का मार्गदर्शन और रणनीति थी दोनों का लक्ष्य केवल आज़ादी नहीं था, बल्कि एक समानतामूलक और न्यायपूर्ण समाज बनाना अंग्रेजी शासन का अंत करना युवाओं में क्रांतिकारी चेतना जगाना।हालांकि आज़ाद अधिक व्यावहारिक और अनुशासनप्रिय थे, जबकि भगत सिंह अधिक वैचारिक और दार्शनिक दृष्टिकोण रखते थे। दोनों के बीच गहरा विश्वास था आज़ाद ने हमेशा भगत सिंह की रक्षा करने की कोशिश की भगत सिंह भी आज़ाद का सम्मान एक गुरु की तरह करते थे,जब भगत सिंह गिरफ्तार हुए, तब आज़ाद ने उन्हें छुड़ाने के प्रयास भी किए, लेकिन सफलता नहीं मिली। चन्द्रशेखर आज़ाद ने 1931 में इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (अब आज़ाद पार्क) में खुद को गोली मारकर अंग्रेजों के हाथों पकड़े जाने से बचा लिया कुछ ही समय बाद भगत सिंह को फांसी दे दी गई दोनों की शहादत ने पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वे एक गहरे सामाजिक चिंतक भी थे। उनके विचारों में सामाजिक समरसता (Social Harmony) का विशेष स्थान था। वे ऐसे भारत की कल्पना करते थे जहाँ जाति, धर्म, वर्ग और ऊँच-नीच के भेदभाव का कोई स्थान न हो। भगत सिंह का मानना था कि सच्ची आज़ादी केवल अंग्रेजों से मुक्ति तक सीमित नहीं है। जब तक समाज में असमानता और भेदभाव रहेगा, तब तक स्वतंत्रता अधूरी रहेगी ,वे एक ऐसे समाज की स्थापना चाहते थे जहाँ सभी को समान अधिकार और सम्मान मिले। भगत सिंह ने भारतीय समाज में फैले जाति भेदभाव का खुलकर विरोध किया वे मानते थे कि जाति व्यवस्था समाज को कमजोर करती है, यह मनुष्य को मनुष्य से अलग करती है उन्होंने सामाजिक समानता को राष्ट्र की मजबूती के लिए आवश्यक बताया। भगत सिंह चाहते थे कि समाज में आर्थिक असमानता समाप्त हो गरीब और अमीर के बीच की खाई कम हो हर व्यक्ति को समान अवसर मिले, उनका मानना था कि सामाजिक समरसता के लिए आर्थिक न्याय भी जरूरी है। भगत सिंह युवाओं को केवल स्वतंत्रता के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के लिए भी प्रेरित करते थे। वे चाहते थे कि युवा अंधविश्वास, जातिवाद और भेदभाव के खिलाफ खड़े हों समाज में जागरूकता और भाईचारे को बढ़ावा दें अपने लेखों और भाषणों में भगत सिंह ने बार-बार यह बात कही कि क्रांति का अर्थ केवल सत्ता परिवर्तन नहीं है बल्कि समाज में समानता और न्याय की स्थापना है। भगत सिंह शायरी और क्रांतिकारी गीतों के बहुत शौकीन थे। वे खुद बड़े शायर नहीं थे, लेकिन उर्दू-हिंदी की क्रांतिकारी शायरी गुनगुनाते और सुनाते थे। उनके पसंदीदा शेर आज भी देशभक्ति और जोश का प्रतीक हैं। यह सबसे प्रसिद्ध शेर है, जिसे राम प्रसाद बिस्मिल से जोड़ा जाता हैसरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है जोर कितना बाजुए-कातिल में है। यह शेर भगत सिंह और उनके साथियों के बीच बेहद लोकप्रिय था और वे इसे अक्सर गाते/दोहराते थे। मेरा रंग दे बसंती चोला, माय रंग दे बसंती चोला यह गीत देश के लिए बलिदान की भावना को दर्शाता है और जेल में भी गाया जाता था। कभी वो दिन भी आएगा कि जब आज़ाद हम होंगे, ये अपनी ही ज़मीं होगी, ये अपना आसमां होगा। वक्त आने दे बताएंगे तुझे ऐ आसमां,हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है। यह शेर उनके आत्मविश्वास और क्रांतिकारी जज़्बे को दर्शाता है। जेल में रहते हुए भगत सिंह साथियों के साथ गुनगुनाते थे शेरों के माध्यम से हौसला बढ़ाते थे भगत सिंह के लिए शायरी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि क्रांति की आवाज थी। वे जिन शेरों को गाते थे, वे आज भी युवाओं में देशभक्ति, साहस और बलिदान की भावना जगाते हैं। भगत सिंह की फांसी (23 मार्च 1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे निर्णायक और भावनात्मक घटनाओं में से एक थी। उनके साथ सुखदेव और राजगुरु को भी फांसी दी गई। भगत सिंह को लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी की सजा दी गई थी सामान्यतः फांसी सुबह दी जाती थी, लेकिन इन्हें शाम लगभग 7 बजे फांसी दी गई यह कार्य गुप्त रूप से किया गया ताकि जनता में विद्रोह न भड़क जाए फांसी के समय तीनों क्रांतिकारी “इंकलाब जिंदाबाद” के नारे लगा रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने जनता के आक्रोश से बचने के लिए उनके शवों के साथ असामान्य व्यवहार किया रात में ही जेल की पिछली दीवार तोड़कर शव बाहर निकाले गए उन्हें गुप्त रूप से फिरोजपुर (पंजाब) की ओर ले जाया गया सतलुज नदी के किनारे जल्दबाजी में उनका अंतिम संस्कार करने का प्रयास किया गया अंग्रेजों ने बिना किसी धार्मिक विधि के जल्दबाजी में चिता जलाई लेकिन स्थानीय लोगों को इसकी जानकारी मिल गई ग्रामीणों और देशभक्तों ने वहां पहुंचकर अधजले अवशेषों को एकत्र किया पूरे सम्मान और विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया आज वह स्थान हुसैनीवाला (पंजाब) में शहीद स्मारक के रूप में प्रसिद्ध है। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया लोगों में अंग्रेजों के प्रति भारी आक्रोश पैदा हुआ भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु राष्ट्रीय नायक बन गए उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इस घटना का भारत की आज़ादी की लड़ाई पर गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ा शहरों और गाँवों में व्यापक विरोध हुआ लोग सड़कों पर उतर आए अंग्रेजी शासन के प्रति आक्रोश और बढ़ गया ,उनकी शहादत ने आम जनता को स्वतंत्रता आंदोलन से और अधिक जोड़ दिया। भगत सिंह युवाओं के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत बन गए। हजारों युवा स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए क्रांतिकारी संगठनों को नया बल मिला “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा पूरे देश में गूंजने लगा उनकी शहादत ने युवाओं में बलिदान और साहस की भावना को मजबूत किया। भगत सिंह की फांसी के बाद आंदोलन की दिशा में भी बदलाव देखा गया क्रांतिकारी आंदोलन को नई पहचान मिली अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष और तीव्र हो गया भगत सिंह की लोकप्रियता किसी एक क्षेत्र या वर्ग तक सीमित नहीं थी। वे पूरे भारत के नायक बन गए जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर लोगों को जोड़ा उनकी शहादत ने राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया। फांसी के बाद ब्रिटिश सरकार की छवि और खराब हुई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आलोचना हुई भारतीयों के बीच अंग्रेजों के प्रति असंतोष और बढ़ा,शासन को अधिक दमनकारी कदम उठाने पड़े भगत सिंह की शहादत ने उन्हें अमर बना दिया। उनके विचार और लेख व्यापक रूप से फैलने लगे समाजवाद, समानता और न्याय की उनकी सोच ने नई पीढ़ी को प्रभावित किया वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा बन गए। भगत सिंह की फांसी ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को नई ऊर्जा, दिशा और गति प्रदान की। उनकी शहादत ने यह साबित कर दिया कि बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन्होंने देशवासियों के दिलों में आज़ादी की ज्वाला को और प्रज्वलित कर दिया, जो अंततः 1947 में स्वतंत्रता के रूप में फलीभूत हुई। इस प्रकार, भगत सिंह की फांसी भारत की आज़ादी की राह में एक टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुई। राष्ट्रीय कवि श्रीकृष्ण सरल ने भगत सिंह कविता में भगत सिंह की फांसी को अपने भावों में कुछ इस प्रकार से व्यक्त किया है। वह दीप बुझा, जिससे जग में स्वाधीनता का प्रकाश हुआ। वह वीर गया, जिससे भारत मां का ऊँचा मस्तक हुआ।। हँसते-हँसते चढ़ गया फाँसी, मातृभूमि पर बलि-बलि गया। मृत्यु भी जिसके चरण चूमकर अमरत्व का वरदान लिया।। नवयुवकों के हृदयों में वह, ज्योति प्रखर बन जलता है। अन्यायों के विरुद्ध सदा वह स्वर बनकर निकलता है।। शहीदों की उस पावन गाथा, का वह अमर पुजारी था। भारत माँ के चरणों में जो, जीवन अर्पणकारी था।। भगत सिंह भारतीय स्वातंत्र्य समर की अपरिमित ऊर्जा तेजस्विता थे वह कम उम्र में ही देश के करोड़ों देशवासियों को दिलों में स्वराज की लौ जला गए। (प्रदेश उपाध्यक्ष भारतीय जनता पार्टी मध्य प्रदेश निमाड़ संभाग प्रभारी) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 22 मार्च /2026