मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बड़े उधोगपति मुकेश अंबानी और गौतम अडानी को बड़ी राहत दी है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) द्वारा ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) के कुओं से 1.55 बिलियन यानी करीब 13,700 करोड़ रुपये की नेचुरल गैस चोरी के आरोपों की सीबीआई जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायाधीश सुमन श्याम की बेंच ने अपना फैसला सुनाया। इस केस में याचिकाकर्ता का इरादा साबित नहीं हुआ है। जनहित याचिका दाखिल करते समय याचिकाकर्ता का इरादा नेक होना चाहिए। लेकिन, इस केस में ऐसा नहीं देखा गया। इसी बात को हाईलाइट करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिकर्ता को कोई राहत देने से मना करते हुए याचिका खारिज कर दी। * क्या थी याचिका ? सिलवासा के रहने वाले जितेंद्र पी. मारू (61) ने बॉम्बे हाई कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी, जिसमें रिलायंस के चेयरमैन मुकेश धीरूभाई अंबानी और कंपनी के डायरेक्टर्स पर चोरी, गलत काम और भरोसा तोड़ने का आरोप लगाया गया था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि 2004 से 2013-14 के बीच आंध्र प्रदेश के तट पर कृष्णा-गोदावरी बेसिन से गैस चोरी हुई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि रिलायंस ने बिना किसी परमिशन के पड़ोसी ओएनजीसी के कुओं में ड्रिलिंग करके अपने गहरे समुद्र के कुओं से गैस चुराई थी। यह एक संगठित धोखाधड़ी था और एक बड़ी पहले से प्लान की गई साज़िश का हिस्सा था। इसमें कई वरिष्ठ अधिकारी भी रिश्वत देकर शामिल थे। आरोप लगाया गया था कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के अधिकारियों को 2000 करोड़ रुपये बांटे गए थे। पूरी साज़िश मुंबई में रची गई थी, इसलिए बॉम्बे हाई कोर्ट में प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग करते हुए एक याचिका दाखिल की गई थी। ओएनजीसी के अधिकारियों को 2013 में चोरी का पता चला और उन्होंने तुरंत केंद्र सरकार को इसकी जानकारी दी। लेकिन मुआवजा मांगने के अलावा अभी तक कोई क्रिमिनल एक्शन नहीं लिया गया है। अपना दावा साबित करने के लिए याचिकाकर्ता ने न्यूयॉर्क की एक कोर्ट से मिले कुछ कागजात बॉम्बे हाई कोर्ट में जमा किए थे। * सीबीआई की भूमिका बॉम्बे हाई कोर्ट में सीबीआई के वकील अमित मुंढे ने कहा, इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट बेंच का दिया गया ऑर्डर साफ है। उस ऑर्डर में एफआईआर दर्ज करने का कोई निर्देश नहीं है। इसलिए, कंप्लेंट बंद कर दी गई और एप्लीकेंट को 30 सितंबर 2025 के इस फैसले के बारे में बताया गया। भारत सरकार ने इस मामले में केस दर्ज करने की कोई मांग नहीं की है। साथ ही, ओएनजीसी ने भी ऐसी कोई मांग नहीं की है। अगर उन्हें सही लगता है, तो उनके पास इस मामले में एफआईआर दर्ज करने के लिए सीबीआई से संपर्क करने का विकल्प है। इसलिए, यह याचिका न तो कानून के हिसाब से स्वीकार्य है और न ही फैक्ट्स पर आधारित है। * क्या है रिलायंस का दावा ? रिलायंस ने इस याचिका का विरोध किया था और बॉम्बे हाई कोर्ट में इन सभी आरोपों को खारिज कर दिया था। उनका दावा था कि यह गैस माइग्रेटेड थी, यानी यह अपने आप उनके कुओं में आई थी। इसलिए, रिलायंस को इसे निकालने का पूरा अधिकार था। हालांकि, फर्म डी एंड एम (डी-गोलायर और मॅक-नॉटन) की जांच में रिलायंस ने माना था कि उसने बिना अनुमति के गैस निकाली थी। इसके बाद, केंद्र सरकार की अपील में बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि रिलायंस का माइग्रेटेड गैस का दावा झूठा था। * क्या है मामला? यह मामला 2000 के दशक की शुरुआत में शुरू हुआ था। इस दौरान, रिलायंस और ओएनजीसी को केजी बेसिन में ब्लॉक दिए गए थे। ओएनजीसी के पास मौजूद बड़े ब्लॉक के आस-पास रिलायंस के 12 ब्लॉक थे। साल 2013 में, ओएनजीसी ने देखा कि उसके गैस रिज़र्व धीरे-धीरे कम हो रहे हैं। बाद में, जब उन्होंने डीप इंस्पेक्शन किया, तो उन्हें यह बात पता चली। मामले की जांच करने वाली एपी शाह कमेटी ने तय किया है कि गैस चोरी की रकम 1.55 बिलियन या भारतीय करेंसी में लगभग 13,700 करोड़ रुपया है, और इस पर ब्याज 174.9 मिलियन या लगभग 1,458 करोड़ रुपया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने फरवरी 2025 में रिलायंस को राहत देते हुए कहा था कि यह दावा पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ है। इस मामले में हाई कोर्ट में राहत मांगते हुए याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि यह सिर्फ एक सिविल विवाद नहीं बल्कि एक अपराध है। चोरी, बेईमानी और विश्वासघात से जुड़े कानून की धाराएं लगाई जानी चाहिए। इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने सीबीआई और केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर सभी संबंधित दस्तावेज कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया था। इसके अनुसार, बॉम्बे हाई कोर्ट में इस याचिका पर विस्तृत सुनवाई हुई। जिसमें दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और रिलायंस के पक्ष में फैसला सुनाया गया। * क्या था अडानी मामला ? याचिका में दावा किया गया है कि सोलर पावर कॉन्ट्रैक्ट में 2,000 करोड़ रुपये की रिश्वत के बदले, संबंधित अधिकारियों का इरादा बढ़ी हुई दरों पर बिजली खरीदने और सप्लाई करने का था। इस रिश्वत से जुड़े पेमेंट इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस में रिकॉर्ड किए गए थे। इन डिवाइस को अडानी ग्रीन के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सागर अडानी ने अपने पास रखा था। पिटीशन में यह भी दावा किया गया है कि यूएस फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (एफबीआईI) ने भी इन डिवाइस को सबूत के तौर पर जब्त करके यूएस कोर्ट में जमा किया था। आरोपी भारतीय कंपनियों के हेड हैं। इसलिए, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि चूंकि रिश्वत भारतीय सरकारी एजेंसियों और बिजली डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी थी, इसलिए सीबीआई से इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने की उम्मीद थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनी गईं और अडानी के पक्ष में फैसला सुनाया गया। संतोष झा-२७ मार्च/२०२६/ईएमएस