-खारे पानी से बंजर हुई जमीन को बनाया आजीविका का साधन, सानिकट्टा गांव की परंपरा बनी मिसाल बेंगलुरु,(ईएमएस)। कर्नाटक के तटीय क्षेत्रों में सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है, जहां खारे पानी से बंजर हुई जमीन को लोगों ने अपनी आजीविका का मजबूत आधार बना लिया है। सानिकट्टा गांव में पिछले लगभग 300 वर्षों से नमक की पारंपरिक खेती की जा रही है, जो आज भी करीब 200 परिवारों की रोजी-रोटी का मुख्य साधन बनी हुई है। समुद्र के खारे पानी के कारण इस क्षेत्र की जमीन पारंपरिक खेती के लिए उपयुक्त नहीं रही। लेकिन स्थानीय समुदाय ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए ‘नमक के खेत’ विकसित किए। यह अनूठी पहल न केवल उनकी आजीविका का स्रोत बनी, बल्कि क्षेत्रीय पहचान भी बन गई। पीढ़ियों से चला आ रहा पारंपरिक ज्ञान नमक उत्पादन की यह विधि पूरी तरह प्राकृतिक और पारंपरिक है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती आई है। किसान जमीन में समुद्री खारे पानी को रोकते हैं और फिर सूरज की गर्मी से पानी को वाष्पित होने देते हैं। इस प्रक्रिया के बाद जो नमक के क्रिस्टल बनते हैं, उन्हें सावधानीपूर्वक इकट्ठा किया जाता है। शुद्धता के लिए प्रसिद्ध नमक यहां तैयार होने वाला भूरा नमक अपनी शुद्धता के लिए जाना जाता है। स्थानीय स्तर पर इसे स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर माना जाता है, और कई डॉक्टर भी इसके उपयोग की सलाह देते हैं। बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया के तैयार होने के कारण यह नमक पूरी तरह प्राकृतिक होता है। ‘सफेद सोना’ बना सहारा नमक की खेती ने खारेपन की समस्या को ‘सफेद सोना’ में बदल दिया है। जहां एक समय यह भूमि बेकार मानी जाती थी, वहीं आज यही जमीन सैकड़ों परिवारों के लिए आय का स्थायी स्रोत बन चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल देश के अन्य तटीय और खारे क्षेत्रों के लिए प्रेरणा बन सकता है। यह न केवल पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सही सोच और सामूहिक प्रयास से प्राकृतिक चुनौतियों को अवसर में बदला जा सकता है। हिदायत/ईएमएस 30 मार्च 2026