- जमीन पर ‘राम भरोसे’ सुरक्षा भोपाल (ईएमएस)। राजधानी में हाई सिक्योरिटी क्षेत्र में सतपुड़ा भवन से लेकर मंत्रालय वल्लभ भवन तक लगी आग की घटनाओं ने शहर की फायर सेफ्टी व्यवस्था की सच्चाई को उजागर कर दिया है। हर बार हादसे के बाद बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। राजधानी का फायर सेफ्टी सिस्टम अब भी हादसे के बाद जागने वाला यानी रिएक्टिव मोड में काम कर रहा है। जबकि जरूरत एक ऐसे सिस्टम की है जो हादसे से पहले ही तैयार रहे। गर्मी के इस मौसम में जब भोपाल में फायर ब्रिगेड सिस्टम को देखा तो यह जमीनी स्तर पर राम भरोसे चल रहा है। भोपाल को झीलों और हरियाली का शहर कहा जाता है, लेकिन सुरक्षा के मामले में यह शहर गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। तेजी से बढ़ती आबादी और ऊंची इमारतों के बीच फायर सेफ्टी का ढांचा उसी गति से विकसित नहीं हो पाया। पुराने संसाधन, कम स्टाफ और प्रशिक्षण की कमी ने इस सिस्टम को कमजोर बना दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई बड़ा हादसा हुआ तो क्या राजधानी तैयार है? पुरानी गाडिय़ां, कमजोर सिस्टम भोपाल फायर ब्रिगेड के बेड़े में शामिल अधिकांश गाडिय़ां 15 से 20 साल पुरानी हैं। जिन्हें रिटायर होना चाहिए था, वे आज भी इस्तेमाल में हैं। मेंटेनेंस की कमी के कारण किसी भी समय तकनीकी फेलियर का खतरा बना रहता है। यहां के कर्मचारी बताते हैं कि हमारे वाहन चुस्त-दुरुस्त हों, ऐसा हो नहीं पा रहा है। यहां छोटी-छोटी सी बातों के लिए अफसरों की अनुमति लेना पड़ता है और वे भी बजट नहीं होने की बात कहते हैं। हाई-राइज बिल्डिंग्स, बढ़ता खतरा शहर तेजी से वर्टिकल हो रहा है। बहुमंजिला इमारतें बढ़ रही हैं, लेकिन उनके हिसाब से फायर सिस्टम अपडेट नहीं हुआ। हाईटेक मशीनों की कमी साफ दिखाई देती है। पुराने शहर की गलियों में फायर ब्रिगेड जा नहीं पाती और यहां आग की घटनाओं में पूरा सिस्टम हैंग नजर आता है। प्रशासन ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया और ना ही इन गलियों की इमारतों में फायर सिस्टमों की जांच होती है। स्टाफ की कमी और प्रशिक्षण का अभाव फायर सेफ्टी सिर्फ मशीनों से नहीं चलती। इसके लिए प्रशिक्षित स्टाफ जरूरी है। लेकिन यहां पिछले 15 सालों से नई भर्ती नहीं हुई। कर्मचारियों को नियमित ट्रेनिंग भी नहीं मिलती। इतना ही नहीं जो स्टाफ है उसकी फिटनेस, हेल्थ और बीमा को लेकर पर स्थिति साफ नहीं है। जो कर्मचारी अपनी जान जोखिम में डालते हैं, उन्हें मात्र 10 से 11 हजार रुपये वेतन मिलता है। प्रमोशन न मिलने से उनमें असंतोष बढ़ रहा है। फायर विभाग को नगरीय विकास विभाग को सौंपे जाने के बाद हालात सुधरने के बजाय बिगड़े हैं। अब बेसिक मेंटेनेंस के लिए भी बजट की कमी बताई जा रही है। विनोद / 30 मार्च 26