राष्ट्रीय
30-Mar-2026
...


नई दिल्ली,(ईएमएस)। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सियासी गलियारे में दिग्गी राजा के नाम से मशहूर दिग्विजय सिंह की राज्यसभा की पारी अगले महीने समाप्त होने वाली है। लेकिन सियासी हलकों में बड़ा सवाल यही है कि राज्यसभा से विदाई के बाद वे क्या करने वाले है। मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री और एआईसीसी महासचिव रहे दिग्विजय कांग्रेस पार्टी के अहम सिपहसालार तथा रणनीतिकार की भूमिका में रहे हैं। वे भले ही 79 साल की उम्र में प्रवेश कर चुके हैं, लेकिन अनुशासित जीवनशैली ने उन्हें आज भी पूरी तरह से चुस्त और तंदुरुस्त बनाए रखा है। दिग्गी राजा के बेटे जयवर्द्धन सिंह मध्य प्रदेश की राजनीति में जड़ें जमा चुके हैं। इसके बाद अपने गृह प्रदेश में उनके लिए गुंजाइश थोड़ी कम हो गई है। राष्ट्रीय राजनीति में भी दिग्विजय के लायक कोई ओहदा खाली दिखाई नहीं दे रहा। बात दें कि सितंबर-अक्टूबर 2022 को पार्टी हाईकमान के खिलाफ अशोक गेहलोत की अप्रत्याशित बगावत ने दिग्विजय के लिए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का 88वां अध्यक्ष बनने की राह अचानक से खोल दी थी। तब उन्हें राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को छोड़कर आनन-फानन में दिल्ली आना पड़ा था। यह सियासी विडंबना ही थी कि दिग्विजय ने जिस वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खरगे से आशीर्वाद मांगा, कुछ घंटों बाद वे अध्यक्ष पद के लिए उन्हीं के नाम का अनुमोदन करते दिखाई दिए। अनौपचारिक वार्ताओं में राहुल गांधी को यह मशविरा दिया गया है कि बहुसंख्यक समुदाय के बीच पार्टी की पैठ बनाने के लिए दिग्विजय की सेवाओं का इस्तेमाल विभिन्न साधु-संतों, गुरुओं और हिंदू धर्माचार्यों को जोड़ने वाले एक सेतु के रूप में हो सकता है। दिग्विजय भगवा पार्टियों के ‘हिंदुत्व’ का विरोध कर स्वयं को सनातन धर्म का मुखर समर्थक बताते हैं। वे ‘सच्चे हिंदुत्व’ को परिभाषित करने के मसले पर कई बार भाजपा, आरएसएस, विहिप और अन्य हिंदूवादी संगठनों को ‘शास्त्रार्थ’ की चुनौती दे चुके हैं। उनका कहना है कि जो भी ‘सर्वधर्म समभाव’ में विश्वास नहीं रखता, वह सनातन धर्म का सच्चा अनुयायी नहीं हो सकता। उनके मुताबिक, हमारा सबसे पवित्र ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता है, न कि मनुस्मृति है। इस सप्ताह रामनवमी पर भी दिग्विजय अयोध्या में दिखाई दिए थे। इस मौके पर उन्होंने भाजपा पर परोक्ष हमला करते हुए कहा कि वे न धर्म की राजनीति करते हैं और न धर्म का राजनीति के लिए दुरुपयोग करते हैं। एक दिलचस्प बात यह है कि दिग्विजय को उनके गृहनगर राघोगढ़ में ‘हिंदूपति’ यानी धर्म का रक्षक कहा जाता है। यह उपाधि महान योद्धा पृथ्वीराज चौहान के दौर से जुड़ी है, जिनके वंशज होने का दावा उनका परिवार करता है। पार्टी के अनेक नेताओं का कहना है कि अगर राहुल गांधी दिग्विजय सिंह के पुराने रिकॉर्ड को निकलने पर कई काम सामने आएंगें,जो आज की राजनीति में उन्हें और भी प्रासंगिक ठहराते हैं। फरवरी 2002 का ‘दिघोरी सम्मेलन’ इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसका मकसद राम जन्मभूमि आंदोलन पर विश्व हिंदू परिषद के एकाधिकार को ध्वस्त करना था। दिग्विजय, जो तब मप्र के मुख्यमंत्री थे, ने अपने गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की मदद से कांची कामकोटि पीठ के सम्मानित शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती और पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती को एक मंच पर लाने का कारनामा किया था। इन लोगों ने मिलकर स्वामी स्वरूपानंद की अगुवाई में एक ‘रामालय ट्रस्ट’ का गठन किया था। उन्होंने इसके बाद राम मंदिर निर्माण का जिम्मा विहिप के बजाय इस ट्रस्ट को सौंपे जाने का दावा किया था। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी दिघोरी में इन तीन शंकराचार्यों के साथ मंच साझा किया था। सोनिया के इस रुख से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी काफी असहज हो गए थे। राम मंदिर के मुद्दे पर शंकराचार्यों के साथ सोनिया की नजदीकी पर वाजपेयी ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। उन्होंने सवाल उठाया था कि जब सोनिया शंकराचार्यों के सामने नतमस्तक हो सकती हैं, तब विहिप के संतों से बातचीत करने के लिए उनकी आलोचना क्यों की जा रही है? वाजपेयी ने चुटकी लेकर कहा था, ‘अगर वे शंकराचार्य का आशीर्वाद ले सकती हैं, तब मुझे महंत रामचंद्र परमहंस का आशीर्वाद लेने से वंचित क्यों किया जाना चाहिए?’ कांग्रेस को सत्ता में ले आई थी दिग्विजय की नर्मदा परिक्रमा! दिग्विजय के सियासी सफर में मील का एक और यादगार पत्थर अक्टूबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच की उनकी नर्मदा परिक्रमा है। बेहद कठिन पदयात्रा के दौरान उन्होंने 192 दिनों में करीब 3,325 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उनकी यह पदयात्रा मध्य प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों में से 166 से होकर गुजरी थी। इसका नतीजा यह निकला कि दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा को पटखनी दे दी। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की गिनती एक बेहद कद्दावर क्षत्रप के तौर पर होती है। वे उन चुनिंदा राजनेताओं में शुमार हैं, जो सियासत के तीनों सोपानों (नगरपालिका, विधानसभा और संसद) से गुजर चुके हैं। एक वक्त था जब उन्होंने राहुल गांधी के साथ इतनी नजदीकी से काम किया कि सियासी गलियारों में कई लोगों ने उन्हें राहुल गांधी का ‘गुरु’ तक कहना शुरू कर दिया था। राज्यसभा में अपने विदाई भाषण में दिग्विजय ने वाजपेयी की उन पंक्तियों को दोहराया कि ‘न मैं टायर्ड हूं, न रिटायर्ड हूं। दिग्गी राजा ने कहा कि उन्होंने राजनीतिक जीवन में अपना रास्ता खुद तय किया है। सवाल यह है कि जब वे राजनीति से अपने आप को न टायर्ड मान रहे हैं और न रिटायर्ड, तब क्या इसका मतलब यह है कि अब उनकी नजर उस भूमिका पर रहेगी, जिससे उन्हें 2022 में वंचित कर दिया गया था? आशीष दुबे / 30 मार्च 2026