नई दिल्ली (ईएमएस)। हाल ही में वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर भारत में सांपों की दो नई दुर्लभ प्रजातियों की पहचान की है, जो पहले भारत में कभी दर्ज नहीं की गई थीं। इस खोज को वाइल्डलाइफ इंस्टीटयूट ऑफ इंडिया देहरादून के वैज्ञानिकों ने अंजाम दिया है, जिससे पूर्वोत्तर भारत के पारिस्थितिकी तंत्र की अहमियत और बढ़ गई है। देश में पहले से ही 300 से अधिक सांपों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से करीब 60 ही जहरीली हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, हाल ही में खोजी गई ये दोनों प्रजातियां कीलबैक समूह से संबंधित हैं, जिन्हें काफी दुर्लभ माना जाता है। इससे पहले ये सांप केवल म्यांमार में पाए जाने की जानकारी थी, लेकिन अब इनकी मौजूदगी भारत में भी दर्ज की गई है। मिजोरम के नगेंगपुई वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में रखाइन कीलबैक प्रजाति का सांप पाया गया है, जबकि अरुणाचल प्रदेश के नामदाफा नेशनल पार्क में कचिन हिल्स कीलबैक की पहचान की गई है। इन दोनों क्षेत्रों को जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्ध माना जाता है। कीलबैक प्रजाति के सांप जहरीले नहीं होते और आमतौर पर पानी या दलदली इलाकों के आसपास रहते हैं। इनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी खुरदरी और उभरी हुई त्वचा होती है, जो इन्हें अन्य सांपों से अलग बनाती है। इनकी पीठ पर एक खास तरह की उभरी हुई लकीर होती है, जबकि शरीर का रंग हल्का लाल या भूरा होता है। यही संरचना इन्हें अपने आसपास के वातावरण में आसानी से छिपने में मदद करती है। खासकर कीचड़ और वेटलैंड जैसे इलाकों में ये इतने घुल-मिल जाते हैं कि इन्हें पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम और कम खोजे गए क्षेत्रों में अभी भी कई ऐसी प्रजातियां मौजूद हो सकती हैं, जिनका वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। नमदाफा नेशनल पार्क जैसे क्षेत्र, जो ऊंचाई और विविध पारिस्थितिकी के लिए प्रसिद्ध हैं, भविष्य में और भी नई खोजों के केंद्र बन सकते हैं। ऐसे में इन इलाकों में बड़े स्तर पर वैज्ञानिक सर्वेक्षण की आवश्यकता बताई जा रही है। इस खोज को संरक्षण के नजरिए से भी बेहद अहम माना जा रहा है। नई प्रजातियों की पहचान से उनके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाए जा सकते हैं, जिससे जैव विविधता को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर इन दुर्लभ प्रजातियों को समय रहते संरक्षित किया जाए, तो न केवल पारिस्थितिकी संतुलन बना रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक विरासत भी सुरक्षित रह सकेगी। मालूम हो कि भारत अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है और अब इसमें एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। सुदामा/ईएमएस 01 अप्रैल 2026