बिहार के नालंदा जिले में स्थित शीतला मंदिर नालंदा में मंगलवार को घटी भगदड़ की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। धार्मिक आस्था और श्रद्धा के बीच अचानक मची अफरा तफरी ने आठ महिलाओं की जान ले ली और कई अन्य श्रद्धालु घायल हो गए। यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं है बल्कि भीड़ प्रबंधन सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की एक बड़ी विफलता के रूप में सामने आई है। मंदिर परिसर में उस दिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी हुई थी। स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग पंद्रह से बीस हजार लोग मंदिर और मेले के क्षेत्र में मौजूद थे। धार्मिक आयोजन के चलते बड़ी संख्या में महिलाएं और बुजुर्ग दर्शन के लिए पहुंचे थे। भीड़ का दबाव इतना अधिक था कि एक समय पर स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और भगदड़ मच गई। देखते ही देखते लोग एक दूसरे के ऊपर गिरने लगे और चीख पुकार का माहौल बन गया। इस अफरा तफरी में आठ महिलाओं की दर्दनाक मौत हो गई। घटना के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए चार पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया और मंदिर तथा मेला क्षेत्र को बंद कर दिया गया। घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया जहां उनका इलाज चल रहा है। इस घटना पर देश के शीर्ष नेतृत्व ने भी शोक व्यक्त किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मृतकों के प्रति संवेदना व्यक्त की और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। प्रधानमंत्री ने मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की। यह पहली बार नहीं है जब किसी धार्मिक स्थल पर इस तरह की घटना हुई हो। पिछले पांच वर्षों में देश के विभिन्न मंदिरों में भगदड़ की कई घटनाएं सामने आई हैं जिन्होंने प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वर्ष 2021 में हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भीड़ अधिक होने के कारण भगदड़ जैसी स्थिति बनी थी जिसमें कई लोग घायल हुए थे। वर्ष 2022 में जम्मू कश्मीर के वैष्णो देवी मंदिर में नए साल के मौके पर भगदड़ मच गई थी जिसमें कई श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। यह घटना राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी थी और इसके बाद भीड़ नियंत्रण के नए दिशा निर्देश जारी किए गए थे। वर्ष 2023 में मध्य प्रदेश के महाकालेश्वर मंदिर में सावन के दौरान अत्यधिक भीड़ के कारण अफरा तफरी की स्थिति उत्पन्न हुई थी। हालांकि समय रहते स्थिति को नियंत्रित कर लिया गया था लेकिन यह स्पष्ट हो गया था कि व्यवस्थाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर में भी भारी भीड़ के कारण दबाव की स्थिति बनी थी और कई श्रद्धालु घायल हो गए थे। इन सभी घटनाओं में एक समानता रही है और वह है भीड़ का सही तरीके से प्रबंधन न होना। नालंदा की घटना ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि धार्मिक आयोजनों में भीड़ नियंत्रण केवल कागजी योजना तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि उसे जमीन पर प्रभावी रूप से लागू करना आवश्यक है। जब लाखों श्रद्धालु एक साथ किसी स्थान पर पहुंचते हैं तो वहां सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात करना बैरिकेडिंग की उचित व्यवस्था करना और भीड़ के प्रवेश और निकास के लिए अलग अलग मार्ग सुनिश्चित करना अनिवार्य है। स्थानीय लोगों ने भी इस घटना को लेकर प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मंदिर परिसर में भीड़ नियंत्रण के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए थे और सुरक्षा व्यवस्था भी कमजोर थी। यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाते तो इस तरह की त्रासदी को टाला जा सकता था। यह आरोप केवल नालंदा तक सीमित नहीं है बल्कि हर उस स्थान पर लागू होता है जहां इस तरह की घटनाएं होती हैं। धार्मिक आस्था लोगों को एक स्थान पर एकत्रित करती है और यह हमारे समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन जब यही आस्था अव्यवस्था में बदल जाती है तो वह जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि प्रशासन और आयोजन समिति दोनों मिलकर ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं। तकनीक का उपयोग भी इस दिशा में सहायक हो सकता है। सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से भीड़ की निगरानी करना ड्रोन के जरिए स्थिति पर नजर रखना और डिजिटल माध्यम से श्रद्धालुओं की संख्या को नियंत्रित करना जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। इसके साथ ही लोगों को भी जागरूक करने की आवश्यकता है ताकि वे अनुशासन बनाए रखें और प्रशासन के निर्देशों का पालन करें। नालंदा के शीतला मंदिर की यह घटना केवल एक खबर नहीं है बल्कि एक चेतावनी है। यदि अब भी हम नहीं जागे तो भविष्य में ऐसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी और निर्दोष लोगों की जान जाती रहेगी। जरूरत इस बात की है कि हम इस घटना से सबक लें और ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करें जिससे हर श्रद्धालु सुरक्षित तरीके से अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन कर सके। अंततः यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आस्था से नहीं बल्कि उसकी व्यवस्था और संवेदनशीलता से भी होती है। यदि हम अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकते तो हमारी सारी उपलब्धियां अधूरी हैं। नालंदा की यह त्रासदी हमें यही संदेश देती है कि समय रहते सुधार करना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। (वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार -स्तम्भकार) (यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है) .../ 2 अप्रैल /2026