लेख
05-Apr-2026
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अमेरिका इजराइल-ईरान वार दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला रहा है। जान लीजिए कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष अब केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की जेब पर भी साफ दिखने लगा है। नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत जिस तरह से महंगाई के झटके के साथ हुई है, वह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में आर्थिक चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं। ऊर्जा की कीमतों में बढ़ोतरी, सप्लाई चेन में बाधा और वैश्विक अनिशितता, ये सभी कारक मिलकर भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं। अप्रैल के पहले ही दिन जिस तरह एलपीजी, हवाई इंधन (एटीएफ) और प्रीमियम ईंधन की कीमतों में तेज वृद्धि हुई, उसने आम आदमी से लेकर उद्योग जगत तक सभी को प्रभावित किया है। कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और एटीएफ का रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचना यह दर्शाता है कि ऊर्जा क्षेत्र में संकट गहराता जा रहा है। हालांकि आम पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बदलाव नहीं किया गया, लेकिन प्रीमियम ईंधन महंगा होने से परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत पर असर पड़ना तय है। इसका सीधा असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ती है। आमतौर पर हर युद्ध महंगाई बढ़ाने का कारण बनता है, लेकिन इस संघर्ष में खाड़ी देश शामिल हैं, जो दुनिया की ज्यादातर कच्चे तेल और गैस की जरूरत पूरी करते हैं, इसलिए ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से महंगाई और तेजी से बढ़ती है. इसके अलावा समुद्री व्यापार के रास्तों में रुकावट के कारण सामान और कच्चे माल की कमी भी महंगाई बढ़ाती है. जैसे-जैसे युद्ध लंबा खिंचता है, यह समस्या और गंभीर होती जाती है. महंगाई से लोगों की खरीदने की क्षमता कम हो जाती है, ज़रूरी सामान की कमी होती है और सरकारों की इन खर्चों को संभालने की क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे सामाजिक अशांति का खतरा बढ़ता है. यह साफ है कि युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई और जरूरी सामान की कमी का सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है. इसके अलावा सामाजिक अशांति भी होगी, जिसका असर आम लोगों पर ही पड़ेगा.दरअसल भारत अपनी जरूरत का लगभग 80 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। वर्तमान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं, जो भारत जैसे आयात-निर्भर देश के लिए चिंता का विषय है। तेल की कीमत बढ़ने से केवल पेट्रोल-डीजल ही महंगे नहीं होते, बल्कि बिजली उत्पादन, परिवहन और उद्योगों की लागत भी बह जाती है। यही कारण है कि महंगाई का प्रभाव व्यापक होता है। हालांकि राहत की बात यह है कि भारत के पास फिलहाल खाद्यान का पर्याप्त भंडार है। गेहूं और चावल की उपलब्धता मजबूत है, जिससे तत्काल खाद्य संकट की आशंका नहीं है। लेकिन खतरा भविष्य में है। भारत उर्वरकों और कुछ कृषि इनपुट के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। यदि युद्ध लंबा खिंचता है और सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसका असर खेती और खाद्य उत्पादन पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों पर भी युद्ध का असर पड़ता है। शिपिंग महंगी होती है, बीमा लागत बढ़ती है और कई बार रास्ते असुरक्षित हो जाते हैं। इससे आयात-निर्यात दोनों प्रभावित होते हैं। भारत जैसे देश के लिए, जो वैश्विक व्यापार पर निर्भर है, यह एक बड़ी चुनौती बन सकता है। एक और महत्वपूर्ण पहलू है विदेशी मुद्रा और रेमिटेंस। खाड़ी देशों में बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं और वहां से भेजी गई रकम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है। यदि युद्ध के कारण यहां की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, तो इसका असर भारत में आने वाली इस आय पर भी पड़ सकता है। समझने की जरूरत है कि युद्ध का असर केवल महंगाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह रोजगार और उद्योगों पर भी पड़ता है। टेक्सटाइल, केमिकल, सीमेंट और टायर जैसे सेक्टर, जो बड़े पैमाने पर रोजगार देते हैं, उत्पादन लागत बढ़ने के कारण प्रभावित हो सकते हैं। जब उत्पादन महंगा होता है और मांग घटती है, तो कंपनियां लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की संख्या घटा सकती हैं। इससे बेरोजगारी बढ़ने का खतरा भी पैदा होता है। आर्थिक रिपोर्टस के अनुसार, यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो भारत की जीडीपी ग्रोथ में 1 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इसका असर निवेश, रोजगार और सरकारी राजस्व पर भी पड़ेगा। महंगाई बढ़ने से लोगों की क्रय शक्ति घटती है, जिससे बाजार में मांग कम होती है और आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं। हालांकि सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए कुछ कदम उठाए हैं। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती इसका उदाहरण है। साथ ही, खुदरा महंगाई का लक्ष्य 4 प्रतिशत पर बनाए रखने का निर्णय भी आर्थिक स्थिरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अपनी अगली मौद्रिक नीति 9 अप्रैल को घोषित करेगा। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की हर बैठक पर नजर होती है, लेकिन इस बार इस पर विशेष रूप से नजर होगी, क्योंकि महंगाई बढ़ रही है, क्योंकि पश्चिम एशिया में संघर्ष चल रहा है। भले ही एमपीसी व्याज दर में कोई बदलाव न करे, लेकिन उसकी घोषणा वित्तीय बाजारों में शांति लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, खासतौर पर जब अनिश्चितता अधिक है। बाजार भी स्पष्ट दिशानिर्देशों के आने का इंतजार करेगा कि आखिर एमपीसी इस अनिश्चितता को कैसे देख रहा है और भविष्य की मौद्रिक नीति के लिए इसके क्या मायने हैं। महंगाई को लक्षित करने वाली अर्थव्यवस्थाओं जैसे कि भारत में मौद्रिक नीति का एक महत्त्वपूर्ण साधन संचार या सूचना होती है। वित्तीय बाजार एमपीसी के बयानों और आरबीआई गवर्नर को टिप्पणियों को भविष्य में ब्याज दरों के मार्गदर्शन के संकेत के रूप में देखते हैं। जब केंद्रीय बैंक की सूचना जटिल या अस्पष्ट होती है तब बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। अगर देखा जाए तो यह भी सच है कि यदि वैश्विक परिस्थितियां लगातार खराब होती रहीं, तो केवल घरेलू उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। युद्ध के प्रभाव को समझने के लिए हमें यह समझना होगा कि आज की दुनिया एक जुड़ी हुई आर्थिक श्रृंखला है। एक देश में संकट का असर दूसरे देशों तक तेजी से पहुंचता है। जब सप्लाई चेन टूटती है, तो उत्पादन, वितरण और उपभोग तीनों प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि पश्चिम एशिया का संघर्ष भारत में महंगाई के रूप में दिखाई दे रहा है। हालांकि वर्तमान स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर नहीं है, लेकिन संकेत चिंताजनक हैं। विशेषज्ञ भले ही स्पष्ट रूप से महंगाई के बढ़ने की पुष्टि न करें, लेकिन बाजार की वास्तविकता कुछ और ही कहानी कह रही है। आम लोग पहले ही कीमतों में बढ़ोतरी महसूस कर रहे हैं। भविष्य के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह युद्ध कब तक चलेगा। यदि यह जल्द समाप्त होता है, तो बाजार धीरे-धीरे स्थिर हो सकता है। लेकिन यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो महंगाई, व्यापार और आर्थिक विकास तीनों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ेगा। ऐसे समय में जरूरी है कि सरकार सतर्क रहे और समय-समय पर नीतिगत हस्तक्षेप करे। साथ ही, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की ओर तेजी से बढ़ना भी आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह के बाहरी झटकों का असर कम किया जा सके। अंततः यह कहा जा सकता है कि पश्चिम एशिया का युद्ध केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक आर्थिक संतुलन को प्रभावित करने वाली घटना है। भारत जैसे देश के लिए यह एक चेतावनी है कि वैश्चिक अस्थिरता के दौर में आर्थिक मजबूती और आत्मनिर्भरता कितनी महत्वपूर्ण है। महंगाई का यह साया भले ही अस्थायी हो, लेकिन इससे मिलने वाला सबक दीर्घकालिक होना चाहिए। पश्चिम एशिया का यह युद्ध केवल भू-राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि एक आर्थिक चुनौती भी है, जिसका असर भारत जैसे विकासशील देश पर गहराई से पड़ रहा है। महंगाई का यह दौर हमें यह समझने का अवसर भी देता है कि वैश्विक निर्भरता कितनी गहरी है और आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास क्यों जरूरी हैं। आम नागरिक के लिए यह समय संयम और सतर्कता का है, वहीं सरकार के लिए यह एक परीक्षा है कि वह कैसे इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखती है। महंगाई केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक स्थिरता का भी सवाल है। इसलिए जरूरी है कि हम इसचुनौती का सामना समझदारी और दूरदर्शिता के साथ करें।लम्बे समय में युद्ध से व्यापार में रुकावट आती है और अनिश्चितता बढ़ती है, जिससे निवेश कम होता है और दुनिया की जीडीपी वृद्धि धीमी पड़ जाती है. दूसरा, युद्ध और युद्ध के बाद दोबारा निर्माण पर ज्यादा खर्च होने के कारण सरकारों को ज्यादा कर्ज लेना पड़ता है, जिससे सरकारी कर्ज बढ़ता है और भविष्य में वित्तीय दबाव पैदा होता है. तीसरा, युद्ध तकनीकी विकास की दिशा को रक्षा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों की तरफ मोड़ देता है. इससे इन क्षेत्रों में नवाचार बढ़ सकता है, लेकिन साथ ही सामाजिक और विकास से जुड़े क्षेत्रों से संसाधन हटाने पड़ते हैं. कुल मिलाकर, आर्थिक प्राथमिकताएं बदलने से युद्ध संतुलित और टिकाऊ वैश्विक विकास की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है.आज जरूरत है कि दुनिया में शांति बहाल की जाए और विकास को रुकने न दिया जाए। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 5 अप्रैल /2026