लेख
05-Apr-2026
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भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यवस्था, अनुशासन, सुधार और विश्वास का वातावरण बनाना भी होता है। इसी दृष्टि से भारत सरकार द्वारा लाया गया जन विश्वास विधेयक 2026 पहले लोकसभा के बाद अब राज्यसभा से भी पारित होने से इसके कानून के रूप में अमल का रास्ता साफ हो गया। इसके माध्यम से उस व्यवस्था को विदा देने का जतन किया गया है, जिसमें छोटी-छोटी गलतियों या सामान्य नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जेल की सजा का प्रविधान था, अब ऐसा होने पर आर्थिक दंड लगेगा। निश्चित ही इस विधेयक का पारित होना एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है, भारतीय कानूनी परिवेश की एक उजली भोर है। निश्चित तौर यह कानून दंडात्मक व्यवस्था से सुधारात्मक व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत देता है। इसमें लगभग 79 केंद्रीय कानूनों में संशोधन कर 784 प्रविधानों में संशोधन किये गये हैं और 700 से अधिक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है। इससे अदालतों में मुकदमों का बोझ और न्यायिक तंत्र पर दबाव कम होगा। अब ड्राइविंग लाइसेंस की अवधि खत्म होने पर भी वह 30 दिन तक वैध रहेगा और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाने पर सजा के स्थान पर जुर्माने का प्रविधान होगा। इसी तरह अन्य अनेक मामलों में ऐसा होगा। इनमें से कई मामले कारोबारियों से भी जुड़े हैं, जैसे पहले ड्रग्स एवं कास्मेटिक नियमों के उल्लंघन पर जेल हो सकती थी, लेकिन अब केवल जुर्माना लगेगा। जो छोटे कारोबारी प्रायः जटिल नियम-कानूनों के अनचाहे उल्लंघन के कारण दंडित होने के दबाव में भयभीत रहते थे, वे अब भयमुक्त होंगे। भाजपा सरकार एवं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रमुख लक्ष्यों में से एक है भारत की व्यवस्था एवं कानूनों का सरल एवं सुगम बनाना, यह कानून उसी दिशा में एक रचनात्मक एवं सृजनात्मक उपक्रम है। इस विधेयक से न केवल न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम होगा बल्कि नागरिकों, उद्यमियों और निवेशकों में सरकार के प्रति विश्वास भी बढ़ेगा। इसे “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” की अवधारणा को व्यवहार में उतारने वाला कानून भी कहा जा सकता है। दंड नहीं, सुधार की भावना को बल देते हुए इस कानून से आम-जनता को कानून की जटिल प्रक्रियाओं एवं भ्रष्टाचार की व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी। भारतीय न्याय व्यवस्था लंबे समय तक दंड आधारित रही है, जिसमें छोटे-छोटे उल्लंघनों के लिए भी आपराधिक मुकदमे चल जाते थे। इससे अदालतों में मुकदमों का ढेर लग जाता था और आम नागरिक अनावश्यक कानूनी प्रक्रियाओं में उलझ जाते थे। जन विश्वास विधेयक ने इस सोच को बदलने का प्रयास किया है। इससे कानून का उद्देश्य दंड देना नहीं, बल्कि सुधार करना और व्यवस्था बनाए रखना होगा। अपराध की गंभीरता के अनुसार दंड तय करना न्याय के मूल सिद्धांतों के अधिक अनुरूप है। इस कानून से न्यायिक प्रक्रिया तेज होगी और गंभीर अपराधों पर अधिक ध्यान दिया जा सकेगा। यह कानून न्यायिक सुधार की दिशा में भी एक बड़ा ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि इससे न्यायालयों का समय और संसाधन बचेंगे और न्याय प्रणाली अधिक प्रभावी बनेगी। इस कानून का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य व्यापार और उद्योग जगत में विश्वास का वातावरण बनाना भी है। पहले कई छोटे नियमों के उल्लंघन पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हो जाते थे, जिससे उद्यमियों और निवेशकों में भय का वातावरण रहता था। अब आर्थिक दंड के प्रावधान से अनुपालन का बोझ कम होगा और व्यापार करने में आसानी होगी। इससे छोटे उद्यमियों, स्टार्टअप और उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा तथा भारत में निवेश का वातावरण और बेहतर बनेगा। वैश्विक स्तर पर भी भारत की छवि एक सरल और निवेश अनुकूल देश के रूप में मजबूत होगी। इस कानून की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसकी भावना भारतीय संस्कृति के बहुत निकट दिखाई देती है। भारतीय संस्कृति में दंड से अधिक सुधार, प्रतिशोध से अधिक क्षमा और अपराध से अधिक परिमार्जन की परंपरा रही है। हमारे शास्त्रों और परंपराओं में कहा गया है कि मनुष्य से गलती होना स्वाभाविक है, लेकिन उसे सुधार का अवसर मिलना चाहिए। छोटी-छोटी गलतियों के लिए कठोर दंड देना न्याय नहीं, बल्कि अन्याय की श्रेणी में आ सकता है। इस दृष्टि से यदि कानून व्यवस्था में क्षमा, सुधार और परिमार्जन की व्यवस्था हो, तो समाज अधिक मानवीय और संवेदनशील बन सकता है। भारत की संस्कृति दंडात्मक नहीं, बल्कि सुधारात्मक और समन्वयवादी रही है। जन विश्वास विधेयक इसी भावना को आधुनिक कानूनी व्यवस्था में स्थापित करने का प्रयास प्रतीत होता है। यह कानून विश्वास आधारित शासन की ओर अग्रसर होने के साथ मेरा भारत महान् का उद्घोष है। यह कानून सरकार और नागरिकों के बीच विश्वास को मजबूत करने वाला भी है। जब सरकार नागरिकों को अपराधी मानने की बजाय जिम्मेदार नागरिक मानकर कानून बनाएगी, तो नागरिकों में भी कानून के प्रति सम्मान और पालन की भावना बढ़ेगी। विश्वास आधारित शासन किसी भी लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति होता है। भय आधारित शासन में नागरिक कानून से बचने की कोशिश करते हैं, जिससे समाज में भ्रष्टाचार को पनपने का मौका मिलता है जबकि विश्वास आधारित शासन में नागरिक कानून का पालन स्वयं करते हैं। देश एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी का अहसास स्वतः जागता है। भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। विकसित राष्ट्र बनने के लिए केवल आर्थिक विकास ही नहीं, बल्कि न्यायिक, प्रशासनिक और कानूनी सुधार भी आवश्यक हैं। जन विश्वास विधेयक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। सरल कानून, कम सरकारी हस्तक्षेप, तेज न्याय प्रणाली और व्यापार के लिए अनुकूल वातावरण-ये सभी विकसित राष्ट्र की पहचान होते हैं। इस दृष्टि से यह कानून भारत को आधुनिक और विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में सहायक सिद्ध होगा। यह भी स्वीकार करना होगा कि इस प्रकार के बड़े कानूनी सुधार राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं होते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने कई प्रशासनिक और कानूनी सुधार किए हैं, जिनका उद्देश्य शासन को सरल, पारदर्शी और जनहितकारी बनाना है, न्याय व्यवस्था को ज्यादा मानवीय एवं व्यावहारिक बनाना है। इसी कारण प्रधानमंत्री ने इस विधेयक के पारित होने पर यह आशा व्यक्त की कि इसके जरिये भरोसे पर आधारित व्यवस्था का निर्माण होने के साथ आम नागरिक सशक्त बनेंगे। जन विश्वास विधेयक उसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण कदम है, जो यह दर्शाता है कि सरकार नागरिकों को दंडित करने की बजाय उनके साथ विश्वास का संबंध स्थापित करना चाहती है। यह कानून शासन और जनता के बीच विश्वास का पुल बनाने का एक सराहनीय एवं सूझबूझभरा प्रयास है। वास्तव में कानून का शासन ऐसा होना चाहिए, जिसमें मामूली गलती या किसी गफलत या अनजाने में की गई भूल कठोर सजा का कारण नहीं बननी चाहिए। अब जब जन विश्वास विधेयक से हालात में व्यापक बदलाव की उम्मीद की जा रही है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस विधेयक के प्रविधानों से आम जनता को अवगत कराया जाए, ताकि वह अधिकतम लाभ उठा सके और शोषण एवं भ्रष्टाचार से भी बच सके। ध्यान रहे आम लोग सशक्त तब होते हैं, जब वे नियम-कानूनों से भली तरह अवगत होते हैं। जनता को बदले हुए नियम-कानूनों से परिचित कराने का काम सरकार को करना चाहिए। इसी के साथ उसे इसे लेकर सावधान रहना होगा कि छोटे अपराधों में जेल भेजने वाले प्रविधानों की जगह चेतावनी देने और जुर्माना लगाने वाली नई व्यवस्था से समाज में ऐसा कोई संदेश न जाए कि नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जुर्माना देकर बचा जा सकता है। यदि जुर्माना देकर नियम-कानूनों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति बढ़ी तो इस विधेयक का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। सबसे महत्वपूर्ण जुर्माना लेने की परम्परा कहीं प्रशासनिक अधिकारियों एवं न्यायिक अधिकारियों को अधिक भ्रष्ट न बना दे। लोगों को भी यह समझना आवश्यक है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन से ही कोई राष्ट्र प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ता है। निश्चित तौर पर इस कानून से समूची दुनिया में भारतीय कानून अनुकरणीय बनेंगे, कहा जा सकता है कि जन विश्वास विधेयक केवल एक कानूनी संशोधन नहीं, बल्कि शासन की सोच में बदलाव का प्रतीक है। यह कानून दंड से सुधार, भय से विश्वास और जटिलता से सरलता की ओर बढ़ने का संकेत देता हैं। भारतीय संस्कृति में क्षमा, सुधार, परिमार्जन और सह-अस्तित्व की जो परंपरा रही है, यह कानून उसी भावना को आधुनिक कानून व्यवस्था में स्थान देने का प्रयास है। इस कानून का सही ढंग से क्रियान्वयन हुआ, तो यह न केवल न्यायिक व्यवस्था को सरल बनाएगा, बल्कि भारत में विश्वास आधारित शासन की स्थापना करेगा और विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध होगा। (लेखक, पत्रकार, स्तंभकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 5 अप्रैल /2026