लेख
05-Apr-2026
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आज पूरे मीडिया में यूएस- इजराइल और ईरान के युद्ध के 1महीने से ऊपर का समाचार देख देख कर शान्ति भंग हो रही अब तो इस बहस में राजनेता भी अपनी सफाई दे रहें हैं जो राज्यसभा के सांसद भी हैं डिफेन्स एक्सपर्ट का तो समझा जा सकता है लेकिन राजनीती पार्टियों में इस पर बहस करना बिलकुल गलत है इसलिए इसपर किसी भी प्रकार के बयानबाजी से परहेज करना चाहिए कौन आतंकवादी पाल रहा है कौन मिट्टी में मिला देगा इससे अपने को क्या लेना देना अमेरिका के कुछ विमान युद्ध में गिरे और 1पायलेट को वहाँ से निकाल भी लिया तो उसकी ताकत समझ में नहीं आ रही है ईरान मिसायल और ड्रोन से अटैक कर रहा है जहाँ अमेरिका और इजराइल की भीषण बमबारी हो रही है वहाँ यदि जाने गईं है तो निर्दोष नागरिकों की अधिक संख्या है ईरान पर अमेरिका के आर्थिक बैन के बाद ना तो क़ोई लड़ाकू विमान नजर आए ना ही बचाव हेतु क़ोई हेलीकाप्टर ईरान को समझदारी से काम लेना चाहिए अपने नहीं लोगों के हित में क्योंकि जब से उसका सबसे बड़ा पुल अमेरिका ने तोड़ दिया इससे आम नागरिकों को ही परेशानी होगी जिसे बनने में 10 साल से ज्यादा लगे होंगे, आज टेक्नोलॉजी का युग है और जो देश टेक्नोलॉजी में आगे होगा बेशक नुकसान होगा लेकिन अन्त में विजय वही होगा जहाँ आसमान में 100-150 विमान ईरान में बम गिरा रहें हैं वहाँ 2 -4 विमान तो नष्ट हो गया तो उससे उसे क्या फर्क पड़ेगा इजराइल एक छोटा सा देश होकर कई फ्रंट पर युद्ध लड़ रहा है तो नुकसान होगा ही युद्ध विनाशकारी होता है और अमेरिका कभी आधा नहीं छोड़ेगा और उसे भी नुकसान काफी हुआ है लेकिन जहाँ तक आतंकवादी के सपोर्ट करने का सवाल है वहाँ ईरान से ज्यादा तो पाकिस्तान है उसे अमेरिका को ठोकना चाहिए सारा युद्ध अरब में खलीफा बनने की होड़ और निर्दोष नागरिक की मौत का तांडव नृत्य से मानवता शर्मसार हो रही है ईरान और अमेरिका -इजराइल युद्ध से भारत का क्या लेना देना, ऐ उनका युद्ध है वो समझें 1984 में मैं जब टीवी जो ब्लैक एंड वाइट था वहाँ सलमा आगा टीवी पर इराक - ईरान युद्ध के बारे में अन्त में समाचार में सुनता था जो 10 साल तक चली युद्ध में किसी भी देश को कमजोर नहीं समझना चाहिए और शान्ति से ही समाधान निकालना चाहिए बड़बोलापन युद्ध में आग में घी डालने का काम करता है इससे बचना चाहिए विश्व शांति का मूल उपाय युद्ध और हथियार में नहीं समझदारी और इंसानियत में ही निहित है।विज्ञान की प्रगति के साथ विश्वभर में चारों ओर विकास ने नई करवट ली है। विकास के नित नये आयामों से सभी देश अपनी समृद्धि को तीव्र वेग से आगे बढ़ाने में जुट गये हैं। जिसके कई सुखद परिणाम भी सामने आये हैं। विज्ञान ने चिकित्सा स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, यातायात, दूरसंचार, युद्ध उपकरणों इत्यादि सभी क्षेत्रों में आशातीत प्रगति की है और इस ओर अभी भी वैज्ञानिकों का प्रयास जारी है। इस कारण आधुनिक भौतिक साधनों ने इन्सानों का जीवन ही बदल दिया है। सभी देश विज्ञान के आधार पर अपने देश को प्रगतिशील,समृद्धशाली, शक्तिशाली बनाने की होड़ में लगे हुए हैं। इस होड़ अर्थात् प्रतिस्पर्धा को लेकर सभी देश अपनी सुरक्षा के लिए अस्त्रा-शस्त्रों का उत्पादन करने में जुट गये हैं।इस युद्ध में निर्दाेष नागरिकों की बहुत अधिक संख्या में जान जा रही है जो आप नहीं देख पा रहें हैं इसमें कई भारतीय भी हैं इससे युद्ध में झोंके गए लोगों का जीवन अस्त व्यस्थ हो गया है इस जंग में अमेरिका के सैनिकों की भी मौत हो रही है एक देश दुसरे देश के शक्ति प्रदर्शन के चक्कर में अपने देश का ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था तबाह हो रही है व विश्व शांति पर खतरा मंडराने लगा है 1महीने से ऊपर चल रहे इस युद्ध में केवल तबाही मची है व बेगुनाह लोगों की मौत हो रही है अब ऐसा लग रहा है कि यह युद्ध में कहीं परमाणु अस्त्रों का इस्तेमाल न हो जाए लेकिन ऐसा किस उद्देश्य के लिए हो रहा होगा उधर चीन और ताईवान मेँ भी युद्ध के बादल मंडरा रहें हैं जैसा चीन और अमेरिका के इस पर चिंतन करने की आवश्यकता है आज सारे देश में हथियार खरीदने की होड़ लगी है इसे रोकना चाहिए,इस कारण नित्य नये-नये घातक अस्त्रा-शस्त्रों का निर्माण हो रहा है जो कभी भी विनाश के कारण बन सकते हैं। अस्त्रा-शस्त्रों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सम्पूर्ण विश्व चिंतन के सागर में डूबा हुआ है। इससे बचने के लिये सभी देश, जो स्वयं अपनी सुरक्षा के लिये चिंतित होने पर भी अस्त्रा-शस्त्रा के भंडारण में जुटे हुए होने के बाद भी विश्व शान्ति के लिये युद्ध नहीं मानवता को समझना चाहिए, विध्वंशकारी अस्त्र-शस्त्रों से विनाश की स्थिति को जानते हुए भी कई देशों ने एक-दूसरे देश पर आक्रमण कर विनाश लीला का खुला तांडव खेला है। जिसके दुष्परिणामों ने असंख्य इन्सानों की जान ली है। वहाँ अनगिनत देश की समृद्धि की झलक दिखाने वाले निर्माण कार्यों को विध्वंश कर दिया है। चारों ओर तबाही मचाने में किसी प्रकार की कमी नहीं रखी है। विकास को विनाश में बदल दिया है। इस आक्रमणकारी नीति से बचने के लिये सभी अपने देश में शान्ति, खुशहाली, समृद्धि के पक्ष में निःशस्त्रीकरण की फिराक में रहते हैं और इसके लिए सभी देशों का जन समर्थन जुटाने में कटिबद्ध हैं। क्योंकि सभी को विनाश का खतरा सामने दिखाई देता है। आज दुनिया परमाणु युद्ध की तरफ बढ़ रहा है इसके परिणाम हम सभी जानते हैं 76 साल पहले 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर दुनिया का पहला परमाणु बम हमला किया था। इसके तीन दिन बाद जापान के ही नागासाकी शहर पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया। दोनों शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गए। डेढ लाख से अधिक लोगों की पल भर में जान चली गई और जो बच गए वो अपंग हो गए और आज भी जो बच्चे जन्म लेते हैं वे अपंगता के शिकार होते हैं क्योंकि रेडिएशन का खतरा 100वर्षों य़ा इससे भी अधिक रहता है व जिसकी मार मासूम लोगों को भुगतना पड़ता है इसके लिये सभी देशों को निर्दाेष इन्सानों की रक्षा हेतु शांति का संकल्प लेने पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि कभी भी किसी देश पर आक्रमण करने की स्थिति ही नहीं बने व लाखों निर्दोष नागरिकों की मौत ना हो व मानवता जिन्दा रहे । विश्व में अस्त्र-शस्त्रों की होड़ ही आक्रमणकारी बनाने का माध्यम बनती है। वहाँ इन्सान भी आवेश, आक्रोश,गुस्से, बदले की भावना, किसी को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से, किसी का तिरस्कार करने, किसी को दंडित करने के लिये आक्रामक रुख अपनाते हुए आक्रमणकारी होता है तो उसके सामने, सामने वाले के विनाश के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है। आक्रमणकारी की चाह रहती है कि वह जो आक्रमण कर रहा है वह विफल न हो जावे व परमाणु बम के हमला की आशंका बढ़ जाती है । इस कारण इन्सान-इन्सान में घृणा, द्वेषभाव, ईर्ष्या, दुश्मनी आदि उत्पन्न होती है जो इन्सानों की सुख-शांति, अमनचैन छीनती है। ऐसी आक्रमणकारी नीति से बचने के लिये और विश्व में शान्ति स्थापित करने हेतु परमाणु निःशस्त्रीकरण पर अधिक बल देना चाहिए। इसी सुख-शान्ति अमन-चैन के साथ एक-दूसरे के प्रति भाईचारे के भाव बनाने के लिए इन्सान को अन्य किसी इन्सान पर आक्रमणकारी नहीं बल्कि सहयोगी बन कर रहने में ही भलाई है। इससे आक्रमणकारी को भी शांति और संतोष मिलता है। बुरे विचार इसके दिल और दिमाग से हट जाते हैं। ऐसी मानसिक शांति पाने के लिये आक्रमणकारी नहीं बनने की सीख आचार्य तुलसी ने देश की आजादी के बाद मानवता आंदोलन चलाकर विश्व को एक नई दिशा दी। मानवता के आधार पर इन्सान यह सोचे कि मैं आक्रमणकारी नहीं बनूं और न ही सहयोग दूंगा। इस दृढ़ संकल्प द्वारा वह शांति का शंखनाद करने में कदापि पीछे नहीं रहेगा। वर्तमान में इसकी महत्ती आवश्यकता है। इसी प्रकार एक-दूसरे देश पर आक्रमण करता है तब अन्य देश आपस में लड़ने वाले किसी एक देश की आक्रामक नीति में भागीदार बनता है, उसे ममदद देता है, सहयोगी के रूप से दुश्मन समझने वाले देश से युद्ध करता है तब वहाँ सर्वत्रा विनाश ही विनाश होने की संभावना बढ़ती है। ऐसी विषम स्थिति में विश्व शांति को कभी भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। विनाश की इस स्थिति से अपने को दूर रखने के लिए आक्रामक देश को समर्थन सहयोग नहीं देने का संकल्प अणुव्रतों को आधार मानकर किया जाय तो विश्व शांति की स्थिति बन सकती है और इन्सानों को अकाल मृत्यु, बेमौत मरने से बचाया जा सकता है। वहाँ परिवार और समाज में स्नेह, आत्मीयता,भाईचारे की भावना के साथ सहयोग एवं सहानुभूति कर संकल्प लिया जाय तो इन्सान का जीवन स्वर्गमय बन सकता है। ऐसे इन्सान को सुख, चैन, शान्ति से जीवनयापन करने से कोई रोक नहीं सकता।आप ईरान में इस युद्ध की तबाही को नहीं देखा है कैसे खाने पीने और पानी की किल्लत हो रही है और बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों की मौत हुई है वहीँ उसके परोसी देशों में भी कई नागरिकों की जान गईं और उनका अर्थव्यवस्था बुरी तरह नष्ट हो रही है वहाँ तो आपस में ही संघर्ष हो रहा है जहाँ सिर्फ और सिर्फ खौफ व निर्दोष इंसान मारे गए है इसमें इजराइल भी शामिल है अतः जनहित में जंग को रोकना चाहिए। (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 05 अप्रैल 26