राष्ट्रीय
07-Apr-2026
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-सरकार ने भारत में धार्मिक विविधता का दिया उदाहरण नई दिल्ली,(ईएमएस)। केरल के सबरीमाला मंदिर समेत तमाम धार्मिक स्थलों पर महिलाओं को प्रवेश के समान अधिकार से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संविधान पीठ ने मंगलवार को सुनवाई शुरू की। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, एमएम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, एजी मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्य बागची भी शामिल हैं। इस मामले की सुनवाई में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखीं। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोर्ट को ‘धार्मिक संप्रदाय’ और ‘आवश्यक धार्मिक प्रथा’ की संकीर्ण व्याख्या से बचना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि अगर इन अवधारणाओं को बहुत सख्ती से लागू किया गया, तो हिंदू धर्म पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। केंद्र ने धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस मामले में किसी एक पक्ष के साथ खड़ी नहीं है, बल्कि केवल संवैधानिक प्रश्नों पर अपनी राय रख रही है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुनवाई के दौरान केंद्र ने भारत की धार्मिक विविधता का उदाहरण देते हुए अजमेर दरगाह और शिरडी साईबाबा मंदिर का उल्लेख किया। मेहता ने कहा कि भारत में कई धर्मों और संप्रदायों के लोग ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह या निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर दर्शन करने जाते हैं। इससे यह साबित होता है कि भारत में धार्मिक पहचान और आस्था का ढांचा बेहद जटिल और बहुस्तरीय है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग एक अलग संप्रदाय का रूप ले लेते हैं, लेकिन वे बड़े धार्मिक ढांचे का हिस्सा भी बने रहते हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि भारत की धार्मिक संरचना अनूठी और विविधतापूर्ण है। कोर्ट ने कहा कि ‘धार्मिक संप्रदाय’ को परिभाषित करने के लिए अमेरिकी जैसे कठोर सिद्धांतों को आंख बंद करके लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी माना कि एक ही धर्म के भीतर भी कई तरह की परंपराएं और मान्यताएं होती हैं, जिन्हें समझने के लिए व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि फिलहाल सबरीमाला मामले की समीक्षा पर विचार नहीं किया जा रहा है। उन्होंने साफ कहा कि 9 जजों की संविधान पीठ केवल कानूनी सवालों पर ही विचार करेगी। वहीं वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि इस मामले में कोर्ट के पास व्यापक विवेकाधिकार है, लेकिन धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोर्ट हस्तक्षेप कर सकती है, लेकिन यह हस्तक्षेप मामले-दर-मामले के आधार पर ही होना चाहिए, ताकि धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बना रहे। संविधान पीठ में शामिल जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि धर्म का प्रचार करने और जबरन धर्मांतरण कराने में अंतर है। उन्होंने कहा कि संविधान धर्म के प्रचार की अनुमति देता है, लेकिन इसका मतलब जबरन धर्म परिवर्तन नहीं है। संविधान पीठ दोपहर 2 बजे दोबारा बैठी और पक्षकारों की दलीलें सुनीं। यह मामला न सिर्फ महिलाओं के मंदिर प्रवेश से जुड़ा है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक नैतिकता और न्यायालय के हस्तक्षेप की सीमाओं जैसे बड़े सवालों को भी छूता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस अहम मामले की सुनवाई के लिए का विस्तृत शेड्यूल तय किया है। इसके तहत 7 से 9 अप्रैल तक याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनी जाएंगी, जबकि 14 से 16 अप्रैल के बीच विरोधी पक्ष अपने तर्क रखेगा। इसके बाद 21 अप्रैल को री-जॉइंडर यानी जवाबी दलीलों पर सुनवाई होगी और 22 अप्रैल को अमिकस क्यूरी अपनी अंतिम दलीलें पेश करेंगे। कोर्ट ने साफ कहा है कि इस संवेदनशील मामले में अनावश्यक देरी नहीं होगी। सिराज/ईएमएस 07अप्रैल26