नई दिल्ली (ईएमएस)। भारत ने सिर्फ 90 करोड़ डॉलर (लगभग 7,700 करोड़ रुपये) में अपना पहला कमर्शियली वायबल प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित कर लिया. ऐसा करने वाला भारत, रूस और चीन के बाद तीसरा देश है. वर्ष 2004 में यह प्रोजेक्ट शुरू हुआ प्रोजेक्ट था. शुरुआती बजट 42 करोड़ डॉलर का था. अब 22 साल बाद दर्जनों बार डेडलाइन खत्म होने और लागत दोगुनी होने के बाद भारत के हाथ सफलता लगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सिविल न्यूक्लियर के सफर में एक अहम कदम बताया है. अब भारत को परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम पर निर्भर नहीं रहना पडेगा। वर्तमान ऊर्जा खपत की दर से भारत के थोरियम रिजर्व देश को 700 साल से ज्यादा बिजली दे सकते हैं. जबकि ज्यादातर न्यूक्लियर देश यूरेनियम पर खेल रहे हैं, जिनके पास सिर्फ 80-100 साल का ईंधन बचा है. भारत पूरी तरह अलग गेम खेल रहा है. पश्चिमी देश इसलिए भागे क्योंकि यूरेनियम सस्ता मिलता रहा और सोडियम कूलेंट बहुत खतरनाक है. यह हवा के संपर्क में आते ही आग पकड़ लेता है और पानी के संपर्क में आते ही विस्फोट कर देता है. रूस के BN-600 में 1980-1997 के बीच 27 सोडियम लीक और 14 आग की घटनाएं घटीं. फिर भी रूस ने इसे नहीं छोड़ा. भारत ने सब देखा और आगे बढ़ता रहा. जब आपके पास यूरेनियम सिर्फ एक फीसदी हो और थोरियम 25 फीसदी तब इंजीनियरिंग की मुश्किलों का बहाना नहीं बना सकते है. यही बात भारत पर लागू होती है. इस प्रयोग में भारत को 700 साल की ऊर्जा सुरक्षा दिख रही है. सुबोध/०७-०४-२०२६