क्षेत्रीय
08-Apr-2026
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- 33 हजार सडक़ों का डिजिटल रिकार्ड तैयार, कई जिलों में सर्वे 80 प्रतिशत से अधिक भोपाल (ईएमएस)। मध्य प्रदेश में ग्रामीण सडक़ों के निर्माण का तरीका अब बदल गया है। सुगम संपर्कता परियोजना के तहत जियो-इंवेंट्री और सिपरी सॉफ्टवेयर जैसी तकनीकों का उपयोग कर सडक़ निर्माण को पूरी तरह वैज्ञानिक और डेटा आधारित बनाया जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि सडक़ निर्माण में आधुनिक तकनीक का अधिक से अधिक उपयोग किया जाए और गुणवत्ता की निगरानी के लिए ड्रोन तकनीक अपनाई जाए। परियोजना के तहत प्रदेश में करीब एक हजार करोड़ रुपये की लागत से सडक़ें बनाई जाएंगी और 100 से अधिक आबादी वाले मजरों-टोलों को सडक़ सुविधा से जोड़ा जाएगा। जनपद पंचायतों को तीन करोड़ रुपये तक के कार्य स्वीकृत करने के अधिकार भी दिए गए हैं। इस नई तकनीक से सडक़ निर्माण में दोहराव रुकेगा, योजना अधिक सटीक बनेगी और लागत व समय दोनों की बचत होगी। साथ ही गांवों तक बेहतर और स्थायी सडक़ संपर्क सुनिश्चित हो सकेगा। जियो-इंवेंट्री का मतलब है पहले से बनी सडक़ों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना। रिम्स पोर्टल के माध्यम से सडक़ों की लोकेशन, लंबाई और स्थिति को मैप पर दर्ज किया जा रहा है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग, पीएमजीएसवाय और जिला सडक़ों को शामिल किया गया है। इससे यह पता चल सकेगा कि कहां सडक़ पहले से मौजूद है और कहां नई जरूरत है, जिससे एक ही सडक़ दोबारा बनने की समस्या खत्म होगी। अब तक 33 हजार 655 सडक़ों में से 17 हजार 437 सडक़ों का जियो-इंवेंट्री कार्य पूरा हो चुका है। प्रदेश के 9 जिलों में 80 प्रतिशत से अधिक सर्वे हो गया है, जिनमें रतलाम, जबलपुर, आगर-मालवा, मंदसौर और पन्ना प्रमुख हैं। सिपरी सॉफ्टवेयर से तय होगा कहां बनेगी सडक़ सिपरी सॉफ्टवेयर सडक़ निर्माण की पूरी योजना तैयार करने में मदद करता है। इसके जरिए यह तय किया जा रहा है कि सडक़ कहां बनेगी, उसकी लंबाई-चौड़ाई क्या होगी और कितनी लागत आएगी। यही नहीं, यह सॉफ्टवेयर यह भी बताता है कि सडक़ के साथ कहां पुल, पुलिया या कल्वर्ट की जरूरत है। नई सडक़ों के सर्वे, डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) और लागत का अनुमान भी इसी सॉफ्टवेयर से तैयार किया जा रहा है। इससे योजना में पारदर्शिता आएगी और गलत या अधूरी योजना बनने की संभावना कम होगी। ड्रोन और डैशबोर्ड से होगी निगरानी सडक़ निर्माण की गुणवत्ता पर नजर रखने के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। साथ ही जनपद, जिला और राज्य स्तर पर डैशबोर्ड के जरिए काम की मानिटरिंग होगी। मैदानी अमले को भी तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे वे नई प्रणाली को बेहतर तरीके से लागू कर सकें। परियोजना के तहत अब तक सात हजार 135 नई सडक़ों के प्रस्ताव तैयार हो चुके हैं और 29 जिलों में 1771 सडक़ों को स्वीकृति मिल चुकी है। विनोद / 08 अप्रैल 26