लेख
08-Apr-2026
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कमजोर वर्गों के लिए बनाई गई विकास और कल्याणकारी योजनाओं को अक्सर ‘भेदभावपूर्ण’ कहकर आलोचना की जाती है। पहली नज़र में यह तर्क आकर्षक लग सकता है कि जब सरकार कुछ खास वर्गों को लक्षित करके लाभ देती है, तो यह बाकी लोगों के साथ अन्याय है। लेकिन जब इस बात को गहराई से समझा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि यह सोच सामाजिक न्याय की मूल भावना को चुनौती देती है। भारत जैसे देश में, जहाँ लंबे समय से जाति, आर्थिक और सामाजिक असमानताएँ जड़ें जमाए हुए हैं, ऐसी योजनाएँ केवल विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता हैं, और साथ ही यह संविधान द्वारा निर्धारित जिम्मेदारी भी हैं। भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना ने कुछ वर्गों को विशेषाधिकार दिए, जबकि कुछ वर्गों को निरंतर वंचना और भेदभाव का सामना करना पड़ा। सदियों से चली आ रही इस असमानता ने अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य कमजोर वर्गों को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सामाजिक सम्मान से दूर रखा। ऐसे में यदि राज्य केवल ‘समान व्यवहार’ की नीति अपनाता, तो यह असमानता और गहरी हो जाती। इसलिए संविधान निर्माताओं ने यह समझा कि समानता का वास्तविक अर्थ सबको समान स्थिति में लाना है, न कि केवल समान नियम लागू करना। इसी संदर्भ में संविधान का अनुच्छेद 46 विशेष महत्व रखता है, जो राज्य को यह निर्देश देता है कि वह कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा दे तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाए। यह प्रावधान यह स्पष्ट करता है कि लक्षित योजनाएँ किसी प्रकार का पक्षपात नहीं, बल्कि न्याय की दिशा में उठाया गया आवश्यक कदम हैं। यही ‘सकारात्मक भेदभाव’ या ‘affirmative action’ की अवधारणा है, जो ऐतिहासिक असमानताओं की भरपाई करने का प्रयास करती है। इन योजनाओं का प्रभाव केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक स्तर पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। पिछले कुछ दशकों में शिक्षा के क्षेत्र में हुई प्रगति इसका प्रमाण है। जहाँ पहले कमजोर वर्गों की साक्षरता दर बहुत कम थी, वहीं आज इसमें उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। छात्रवृत्ति योजनाओं, आवासीय विद्यालयों और विशेष शैक्षिक कार्यक्रमों ने लाखों बच्चों को स्कूल और उच्च शिक्षा तक पहुँचने का अवसर प्रदान किया है। इसी प्रकार, ग्रामीण रोजगार योजनाओं, स्वयं सहायता समूहों और कौशल विकास कार्यक्रमों ने आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया है। महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी इन योजनाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को न केवल आय के साधन मिले हैं, बल्कि उन्होंने सामाजिक स्तर पर भी अपनी पहचान बनाई है। इससे परिवार और समाज दोनों में सकारात्मक परिवर्तन आया है। यह दर्शाता है कि लक्षित योजनाएँ केवल आर्थिक लाभ तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे सामाजिक बदलाव का माध्यम भी बनती हैं। हालाँकि, इन योजनाओं को लेकर विवाद भी कम नहीं हैं। आलोचकों का कहना है कि जब किसी विशेष वर्ग को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह अन्य वर्गों के साथ अन्याय है। उदाहरण के लिए, कई बार आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग का व्यक्ति केवल इसलिए किसी योजना का लाभ नहीं ले पाता क्योंकि वह निर्धारित श्रेणी में नहीं आता। इससे ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ की भावना उत्पन्न होती है, जो सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकती है। यह तर्क पूरी तरह निराधार नहीं है, लेकिन यह अधूरा अवश्य है। यह इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि सभी व्यक्ति समान परिस्थितियों में जन्म नहीं लेते। कुछ लोग ऐसे सामाजिक और आर्थिक परिवेश में पले-बढ़े होते हैं जहाँ उन्हें बेहतर शिक्षा, संसाधन और अवसर मिलते हैं, जबकि कुछ लोग अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवन की शुरुआत करते हैं। ऐसे में, यदि दोनों को समान अवसर दिए जाएँ, तो परिणाम समान नहीं होंगे। इसलिए, समानता को वास्तविक रूप देने के लिए असमान लोगों के साथ अलग व्यवहार करना आवश्यक हो जाता है। फिर भी, यह स्वीकार करना होगा कि इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कई कमियाँ हैं। भ्रष्टाचार, लाभ का असमान वितरण और पारदर्शिता की कमी जैसी समस्याएँ इनकी प्रभावशीलता को प्रभावित करती हैं। कई बार देखा गया है कि जिन लोगों को इन योजनाओं की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, वे इससे वंचित रह जाते हैं, जबकि अपेक्षाकृत सक्षम लोग इसका लाभ उठा लेते हैं। ‘क्रीमी लेयर’ की अवधारणा इसी समस्या को दूर करने के लिए लाई गई थी, लेकिन इसे सभी वर्गों में प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया है। इसके अतिरिक्त, बदलते समय के साथ समाज की समस्याएँ भी बदल रही हैं। आज शहरी क्षेत्रों में गरीबी का स्वरूप अलग है, जहाँ विभिन्न जातियों के लोग समान आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में केवल जाति के आधार पर योजनाएँ बनाना पर्याप्त नहीं है। नीतियों को अधिक समावेशी और बहुआयामी बनाना होगा, जिसमें आर्थिक स्थिति, शिक्षा और क्षेत्रीय असमानताओं को भी ध्यान में रखा जाए। सुधार के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है—पारदर्शिता और सटीकता। लाभार्थियों की पहचान को अधिक प्रभावी बनाने के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है। आधार-आधारित सत्यापन, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) और डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से योजनाओं को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जा सकता है। इसके साथ ही, योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित निगरानी और स्वतंत्र ऑडिट भी आवश्यक है, ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को समय रहते रोका जा सके। निजी क्षेत्र और नागरिक समाज की भागीदारी भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के माध्यम से शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा, स्थानीय समुदायों को योजनाओं के क्रियान्वयन में शामिल करने से उनकी प्रभावशीलता और भी बढ़ सकती है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर समस्याओं की समझ अधिक गहरी होती है। अंततः, यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि कमजोर वर्गों के लिए बनाई गई योजनाएँ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं, बल्कि न्याय की स्थापना का माध्यम हैं। ये योजनाएँ उस ऐतिहासिक असमानता को दूर करने का प्रयास हैं, जिसने समाज के एक बड़े वर्ग को लंबे समय तक अवसरों से वंचित रखा। यदि इन्हें समाप्त कर दिया जाए, तो यह केवल असमानता को और गहरा करेगा तथा सामाजिक असंतुलन को बढ़ावा देगा। अंबेडकर का सपना केवल राजनीतिक समानता तक सीमित नहीं था, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता भी उसका अभिन्न अंग था। ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के साथ ‘एक व्यक्ति, एक अवसर’ की अवधारणा को साकार करने के लिए इन योजनाओं का अस्तित्व अनिवार्य है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इनके अस्तित्व पर प्रश्न उठाने के बजाय इनके क्रियान्वयन को और अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समावेशी बनाएँ। जब भारत 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब यह याद रखना होगा कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग का सशक्तिकरण है। यदि समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी आत्मनिर्भर और सम्मानजनक जीवन जीने में सक्षम हो जाता है, तभी सच्चे अर्थों में विकास संभव है। इसलिए, कमजोर वर्गों के लिए योजनाएँ न तो विवाद का विषय हैं और न ही बोझ, बल्कि वे एक न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रगतिशील भारत की आधारशिला हैं। डॉ. सत्यवान सौरभ/08 अप्रैल2026 (डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)