स्वतंत्र भारत के 75 वर्षों के इतिहास में महिलाओं ने समाज, परिवार, अर्थव्यवस्था और राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। सेना, प्रशासन, चिकित्सा, कानून, शिक्षा, व्यवसाय और शोध सहित अनेक क्षेत्रों में उन्होंने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है लेकिन राष्ट्रीय क़ानून निर्माण में उनकी भागीदारी नगण्य रही है। वे मतदाता थीं, कार्यकर्ता थीं, समाज की धुरी थीं, उन्हें विधानसभा और लोकसभा में अवसर तो मिले, परंतु उनका प्रतिनिधित्व सुनिश्चित नहीं था। दशकों तक कानून-निर्माण के मंच पर उनकी उपस्थिति राजनैतिक परिस्थितियों और दलों की प्राथमिकताओं व नेताओं की मेहरबानी पर निर्भर रही। तीन दशकों से अधिक समय के लंबे इंतजार के बाद अब यह स्थिति निर्णायक रूप से बदलने जा रही है। यह परिवर्तन एक दिन में नहीं आया बल्कि महिलाओं द्वारा परिणाम की चिंता किये वगैर निरंतर प्रयासों और हर क्षेत्र में अपनी प्रभावी भूमिका की छाप छोड़ने का परिणाम है। महिला आरक्षण संविधान-106वां संशोधन अधिनियम, 2023 के पारित होने के साथ भारत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि महिलाओं का नेतृत्व अब केवल सहायक भूमिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वे राष्ट्र के नीति-निर्माण व क़ानून बनाने में बराबरी से भागीदार होंगी । यह ऐतिहासिक निर्णय एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और महिलाओं के सशक्तिकरण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का सशक्त प्रमाण है। श्री मोदीजी का मानना है कि आरक्षण देने में पहले ही बहुत देरी हो चुकी है इसलिए इसे अब और नहीं टाल सकते । हालांकि, इस संशोधन का क्रियान्वयन आगामी जनगणना और परिसीमन से जुड़ा है इसलिए यह 2029 के आम चुनावों में भी लागू हो सकता है। महिलाओं के राजनैतिक अधिकारों की यात्रा के यहाँ तक पहुँचने में लगभग तीस वर्ष लगे है। 1992-93 में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से पंचायतों और नगरीय निकायों में 33% आरक्षण लागू किया गया, जिससे महिलाओं की भागीदारी का मार्ग कानूनी रूप से प्रशस्त हुआ। इसके बाद कई राज्यों ने इसे 50% तक बढ़ाया। आज देश के 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानीय निकायों में 50% महिला आरक्षण लागू है फलस्वरूप आज महिलाएँ अध्यक्ष, महापौर तथा पार्षद या नगर सेवक के लगभग एक लाख पदों पर प्रभावी नेतृत्व दे रही हैं। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी ने प्रशासनिक पारदर्शिता, सामाजिक न्याय और विकास को नई दिशा दी है। वर्तमान में लगभग साढ़े चौदह लाख से अधिक महिलाएँ ग्रामीण शासन में जिला पंचायत अध्यक्ष, सरपंच व पंच के निर्वाचित पदों पर कार्यरत हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर महिलाएँ उत्कृष्ट नेतृत्व दे सकती हैं। कॉर्पोरेट क्षेत्र में भी महिलाओं ने अपनी क्षमता सिद्ध की है। सेबी द्वारा 2013 में बनाए गए नियमों के तहत 2015 से सभी सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम एक महिला निदेशक की नियुक्ति अनिवार्य की गई। आज देश की 1000 शीर्ष कंपनियों में महिला नेतृत्व एक अनिवार्य और प्रभावी घटक बन चुका है। यह स्पष्ट है कि पिछले 30 वर्षों में महिलाओं का नेतृत्व क्रमिक रूप से विकसित हुआ है। इसी क्रमिक मजबूत आधार के कारण 2023 में महिला आरक्षण विधेयक पारित करना पड़ा, जिससे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ है । यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने का संकल्प है जिससे कुल आबादी का 50 प्रतिशत जो अभी तक मतदान तक सीमित था आने वाले समय में क़ानून निर्माता की श्रेणी में आ जाएगा। दुर्भाग्यवश, आज भी कुछ राजनीतिक दल और विपक्षी नेता इस ऐतिहासिक निर्णय को संदेह की दृष्टि से देखते हुए भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह स्पष्ट है कि महिलाओं को बराबरी का अधिकार देना किसी राजनैतिक लाभ का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने का नैतिक दायित्व है जिसे पूरा करने के लिये एनडीए सरकार, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में इस दिशा में पूरी प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ रही है फिर विपक्ष चाहे कैसी भी पैंतरेबाज़ी करें । पिछले वर्षों में अधिकांश नीतियाँ पुरुष-प्रधान दृष्टिकोण से बनीं, उदाहरणार्थ, जैसे सार्वजनिक स्थलों पर बुनियादी आवश्यकताओं के लिये निर्माण की अनदेखी हुई। स्थानीय निकायों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व ने इस असंतुलन को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किया क्योंकि यह उनकी भी ज़रूरत से जुड़ा था। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि जब नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो निर्णय अधिक संवेदनशील, समावेशी और व्यावहारिक होते हैं जिसमें सारी जनता की ज़रूरतों का समावेश होता है। महिला आरक्षण कानून की आलोचना करने वालों को इसे संकीर्ण राजनैतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए क्योंकि यह भारत के लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में उठाया गया ऐतिहासिक कदम है। आँकड़े बताते हैं कि जब महिलाएँ बराबरी से भागीदारी करती हैं, तो शासन अधिक प्रभावी, नीतियाँ अधिक संतुलित और समाज अधिक सशक्त बनता है। आज महिलाएँ केवल सामाजिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उद्योग, वित्त, तकनीक और प्रशासन के हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। उन्होंने सिद्ध किया है कि वे सक्षम प्रशासक, दूरदर्शी नेतृत्वकर्ता और संवेदनशील निर्णयकर्ता हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि वे उत्कृष्ट कानून-निर्माता भी बनेंगी। देश की महिलाओं ने हर स्तर पर अपनी क्षमता सिद्ध की है। अब समय आ गया है कि उन्हें राष्ट्र के भविष्य को आकार देने में समान अवसर दिया जाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में लिया गया यह निर्णय केवल एक कानून नहीं, बल्कि नारी शक्ति को राष्ट्र निर्माण के केंद्र में स्थापित करने की ऐतिहासिक पहल है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने श्रीमती सुनेत्रा पवार को पहले महाराष्ट्र का उप मुख्यमंत्री और फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित कर अपनी प्रतिबद्धता को सिद्ध कर दिया है। वह दिन दूर नहीं जब राज्यों में हम बड़ी संख्या में महिला मुख्यमंत्रियों को सरकार चलाते हुए देखेंगे । (पूर्व राष्ट्रीय महासचिव व प्रमुख राष्ट्रीय प्रवक्ता, राकांपा है) ईएमएस / 09 अप्रैल 26