लेख
09-Apr-2026
...


- स्वास्थ्य में संतुलन का विज्ञान है होम्योपैथी का दर्शन (विश्व होम्योपैथी दिवस (10 अप्रैल) पर विशेष) प्रतिवर्ष 10 अप्रैल को ‘होम्योपैथी’ के जनक माने जाने वाले जर्मन मूल के चिकित्सक, महान विद्वान, शोधकर्ता, भाषाविद और उत्कृष्ट वैज्ञानिक डा. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनीमैन के जन्मदिवस के अवसर पर ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ मनाया जाता है। होम्योपैथी को आधार बनाने के सिद्धांत से चिकित्सा विज्ञान की एक पूरी प्रणाली को प्राप्त करने का श्रेय डा. हैनीमैन को ही जाता है। इसीलिए उनके जन्मदिवस को ‘विश्व होम्योपैथी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस के आयोजन का उद्देश्य चिकित्सा की इस अलग प्रणाली के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करने के साथ-साथ प्रत्येक व्यक्ति तक इसकी पहुंच की सफलता दर को आसानी से बेहतर बनाना है। 10 अप्रैल 1755 को जन्मे डा. हैनीमैन के पास एमडी की डिग्री थी लेकिन उन्होंने बाद में अनुवादक के रूप में कार्य करने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी थी। उसके बाद उन्होंने अंग्रेजी, फ्रांसीसी, इतालवी, ग्रीक, लैटिन इत्यादि कई भाषाओं में चिकित्सा, वैज्ञानिक पाठ्यपुस्तकों को सीखा। होम्योपैथी एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जो औषधियों तथा उनके अनुप्रयोग पर आधारित है। देश में प्रतिवर्ष केन्द्रीय आयुष मंत्रालय होम्योपैथी दिवस की थीम निर्धारित करता है और देशभर में यह विशेष दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व होम्योपैथी दिवस ‘सतत स्वास्थ्य के लिए होम्योपैथी’ विषय के साथ मनाया जा रहा है। विश्व होम्योपैथी दिवस के अवसर पर इस वर्ष डा. हैनीमैन की 271वीं जयंती मनाई जा रही है। इस दिवस के आयोजन का प्रमुख उद्देश्य भारत सहित दुनियाभर में होम्योपैथी औषधियों की सुरक्षा, गुणवत्ता और प्रभावकारिता को मजबूत करना, होम्योपैथी को आगे ले जाने की चुनौतियों और भविष्य की रणनीतियों को समझना, राष्ट्रीय नीतियों के विकास की रणनीति तैयार करना, अंतरपद्धति एवं अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग, उच्चस्तरीय गुणवत्तापरक चिकित्सा शिक्षा, प्रमाण आधारित चिकित्सा कार्य और विभिन्न देशों में होम्योपैथी को स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में समुचित स्थान दिलाकर सार्वभौमिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त करना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी मानना है कि वैकल्पिक और परम्परागत औषधियों को बढ़ावा दिए बगैर सार्वभौमिक स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों में विश्व में होम्योपैथी का प्रमुख स्थान है। अपनी कुछ अलग ही विशेषताओं के कारण होम्योपैथी आज विश्वभर में सौ से भी अधिक देशों में अपनाई जा रही है तथा भारत तो होम्योपैथी के क्षेत्र में विश्व का अग्रणी देश है। दरअसल होम्योपैथी दवाओं को विभिन्न संक्रमित और गैर संक्रमित बीमारियों के अलावा बच्चों और महिलाओं की बीमारियों में भी विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है। हालांकि होम्योपैथिक दवाओं के बारे में धारणा है कि इन दवाओं का असर रोगी पर धीरे-धीरे होता है लेकिन इस चिकित्सा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह रोगों को जड़ से दूर करती है और इन दवाओं के साइड इफेक्ट भी नहीं के बराबर होते हैं। होम्योपैथी दवाएं प्रत्येक व्यक्ति पर अलग तरीके से काम करती है और अलग-अलग व्यक्तियों पर इनका असर भी अलग ही होता है। होम्योपैथी चिकित्सकों की मानें तो डायरिया, सर्दी-जुकाम, बुखार जैसी बीमारियों में होम्योपैथी दवाएं एलोपैथी दवाओं की ही भांति तीव्रता से काम करती हैं लेकिन अस्थमा, गठिया, त्वचा रोगों इत्यादि को ठीक करने में ये दवाएं काफी समय तो लेती हैं मगर इन रोगों को जड़ से खत्म कर देती हैं। होम्योपैथी के बारे में सरदार वल्लभभाई पटेल का कहना था कि होम्योपैथी को चमत्कार के रूप में माना जाता है। केन्द्रीय होम्योपैथी अनुसंधान परिषद के अनुसार चिकित्सा का ही एक वैकल्पिक रूप है होम्योपैथी, जो ‘समः समम् शमयति’ अथवा ‘समरूपता’ दवा सिद्धांत पर आधारित है, जो दवाओं द्वारा रोगी का उपचार करने की ऐसी विधि है, जिसमें किसी स्वस्थ व्यक्ति में प्राकृतिक रोग का अनुरूपण करके समान लक्षण उत्पन्न किया जाता है, जिससे रोगग्रस्त व्यक्ति का उपचार किया जा सकता है। भारत में होम्योपैथी सबसे लोकप्रिय चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। देशभर में 210 से ज्यादा होम्योपैथी अस्पताल, 8 हजार से ज्यादा होम्योपैथी डिस्पेंसरी और करीब तीन लाख होम्योपैथी प्रैक्टिशनर हैं। भारत में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वावधान में विश्व होम्योपैथी दिवस मनाया जाता है। दिखने में भले ही होम्योपैथी दवाएं एक जैसी लगती हैं किन्तु वास्तव में विश्वभर में होम्योपैथी की 4000 से भी ज्यादा तरह की दवाएं हैं। होम्योपैथी के संस्थापक माने जाने वाले सैमुअल हैनीमैन का कहना था कि इलाज का उच्चतम आदर्श सबसे भरोसेमंद और कम से कम हानिकारक तरीके से स्वास्थ्य की तेज, कोमल और स्थायी बहाली है। चूंकि होम्योपैथी की अनेक दवाओं का प्रभाव रोगी के शरीर पर अपेक्षाकृत धीमी गति से प्रकट होता है जबकि एलोपैथी त्वरित राहत देने के लिए जानी जाती है, इसलिए लोकप्रियता के पैमाने पर दोनों पद्धतियों की तुलना अक्सर की जाती है। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि होम्योपैथी आज भी विश्वभर में सबसे अधिक प्रचलित वैकल्पिक चिकित्सा प्रणालियों में शामिल है। इसका कारण केवल इसकी सुलभता या कम लागत नहीं बल्कि इसकी वह विशिष्ट उपचार पद्धति है, जो शरीर को स्वयं को संतुलित और स्वस्थ करने की दिशा में प्रेरित करती है। होम्योपैथिक उपचार रोग के लक्षणों को दबाने के बजाय उसके मूल कारण तक पहुंचने का प्रयास करता है, जिससे रोग की पुनरावृत्ति की संभावना भी कम हो जाती है। यह पद्धति व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक पहलुओं को एक साथ ध्यान में रखती है, जिससे उपचार अधिक समग्र और प्रभावी बनता है। साथ ही, प्राकृतिक स्रोतों से निर्मित और अत्यंत सूक्ष्म मात्रा में दी जाने वाली दवाएं सामान्यतः दुष्प्रभाव रहित मानी जाती हैं तथा अन्य दवाओं के साथ प्रतिकूल प्रतिक्रिया की संभावना भी न्यूनतम होती है। यही कारण है कि आज के जटिल और दुष्प्रभाव-प्रधान चिकित्सा परिवेश में होम्योपैथी एक सुरक्षित, संतुलित और दीर्घकालिक स्वास्थ्य समाधान के रूप में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं) ईएमएस / 09 अप्रैल 26