राज्य
09-Apr-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। सीबीआई ने इन आरोपों पर भी आपत्ति जताई कि जस्टिस शर्मा जल्दबाजी में मामले की सुनवाई कर रही हैं। सीबीआई के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों को तेजी से निपटाया जाए और इसे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करना पक्षपात नहीं कहा जा सकता। सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) ने दिल्ली हाई कोर्ट में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और अन्य 23 आरोपियों की ओर से दाखिल उस याचिका का विरोध किया है, जिसमें जस्टिस डॉ. स्वर्ण कांता शर्मा को केस से अलग करने की मांग की गई थी। सीबीआई ने इस कोशिश को “तुच्छ, परेशान करने वाला और बेबुनियाद” करार देते हुए कहा कि यह कोर्ट की गरिमा को कम करने की एक कोशिश है। कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में, सीबीआई ने जोर देकर यह भी कहा कि केस से अलग किए जाने को लेकर दाखिल ये याचिकाएं “सिर्फ अंदाजों और अटकलों” पर आधारित हैं और न्यायिक निष्पक्षता पर सवाल उठाने के लिए जरूरी कानूनी मापदंडों को पूरा नहीं करतीं। सीबीआई ने यह भी कहा कि अंतरिम टिप्पणियों या आदेशों से असंतुष्टि, खुद को केस से अलग करने की मांग का आधार नहीं हो सकती। साथ ही, जांच एजेंसी ने चेतावनी भी दी कि अगर इस तरह की कोशिशों को बढ़ावा दिया गया, तो इससे “बेंच हंटिंग” (अपनी पसंद की बेंच चुनने की कोशिश) को बढ़ावा मिलेगा और न्यायिक स्वतंत्रता कमजोर होगी। जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ट्रायल कोर्ट द्वारा केजरीवाल समेत 23 आरोपियों को बरी करने के फैसले के खिलाफ सीबीआई की याचिका पर सुनवाई कर रही हैं। केंद्रीय जांच एजेंसी ने 8 अप्रैल बुधवार को दिल्ली हाई कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर इस बात को गलत बताया कि जस्टिस शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की लीगल विंग अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से विचारधारा के आधार पर जुड़ी हुई हैं। सीबीआई ने कहा कि सिर्फ एबीएपी के सेमिनार में शामिल होना किसी विचारधारा के भेदभाव का संकेत नहीं है। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/09/ अप्रैल /2026