- चीन से सबक ले भारत अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमला करने के बाद सारी दुनिया के देशों में जिस तरह से एनर्जी संकट देखने को मिल रहा है, वह अपने आप में भयाक्रांत करने वाली स्थिति है। भारत अपनी ऊर्जा की लगभग 85 फ़ीसदी ज़रूरतें आयात से पूरा करता है। भारत बड़ी मात्रा में खाद का आयात भी कर रहा है। चीन को भी भारी मात्रा में कच्चे तेल और गैस की जरूरत होती है। चीन पिछले कई वर्षों से कोयले के माध्यम से जिस तरह से अपनी ऊर्जा की जरूरत को लगातार बढाता जा रहा है। इस संकट में चीन ने अपने आप को किस तरह से बचाकर रखा है। भारत क्यों नहीं अपने आप को बचा पाया। इसका विश्लेषण करना जरूरी है। भारत चीन एवं अन्य देशों से खाद का आयात करता है। भारत को खाद संकट से जूझना पड़ रहा है। ऊर्जा संकट होने के बाद भी चीन अपनी जरूरत और निर्यात करने के लिए खाद का उत्पादन किस तरह से कर पा रहा है। यह जानने की भारत सरकार को जरूरत है। चीन के पास गैस फील्ड ना के बराबर है। इसके बाद भी वह कोयला से गैस बनाने का काम बहुत अच्छी तरह से कर रहा है। पिछले वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र में तकनीकी और पूंजी मे बड़ा निवेश किया है। चीन 80 मिलियन मेट्रिक टन प्रतिवर्ष एमएमटीपीए गैस का उत्पादन कर रहा है। भारत चीन के मुकाबले में मात्र 3.5 फ़ीसदी ही कोयले से गैस बना पा रहा है। कोयला चीन और भारत में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। भारत अपने कोयले से गैस का उत्पादन बड़े पैमाने पर कर सकता था। भारत ने इस पर ना तो ध्यान दिया, ना ही इस तरह की नीतियां बनाईं। देश पर हमारे पास जो संसाधन हैं उसका हम उपयोग कर सकें। ऊर्जा के लिए हम विदेशों के ऊपर आश्रित हैं। पिछले 20 वर्षों में हम आयात पर निर्भरता कम नही कर सके। 2007 में यूपीए सरकार ने कोयले से मीथेन गैस बनाने के लिए कार्य योजना तैयार की थी। रानीगंज में एक छोटा पायलट संयंत्र शुरू किया गया था, उसके बाद भारत सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया, जिसके कारण भारत मीथेन गैस के उत्पादन में बुरी तरह से पिछड़ गया है। मोदी सरकार ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। 2020 में मोदी सरकार ने नेशनल कोल गैसीफिकेशन के काम की शुरुआत की। 2030 तक इसमें 100 एमएमटीपीए कोल के इस्तेमाल से गैस उत्पादन का लक्ष्य बनाया गया था। इसके लिए चार लाख करोड़ रुपए का निवेश किया जाना था। इस योजना के लिए पिछले वर्षों में कोई ऐसा काम नहीं हुआ है, जिसे संतोषप्रद कहा जा सके। पिछले 6 वर्षों में इस योजना में कुल 5 एमएमटीपीए का ही हम उपयोग कर पा रहे हैं। चीन की तुलना में भारत बुरी तरह से पिछड़ गया है। भारत सरकार और नीति आयोग की वेबसाइट हैं। उसके अनुसार कोयला से गैस उत्पादन की सात परियोजनाओं को सरकार ने मंजूरी दी है। इसमें 64000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। यह सारी योजनायें सार्वजनिक क्षेत्र के संयुक्त कोल इंडिया लिमिटेड के साथ मिलकर शुरू की जानी थी। इस मंजूरी के बाद भी कोयला और पर्यावरण मंत्रालय में आपसी विवाद के चलते इन परियोजनाओं पर काम शुरू नहीं हो पा रहा है। निजी क्षेत्र की कंपनी अदानी पावर का भी इस मामले में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से कहीं ना कहीं कोई प्रभाव देखने को मिलता है। जिसके कारण इन परियोजनाओं पर जिस तेजी के साथ जो काम होना था, वह नहीं हो पा रहा है। चीन अपनी दूरदर्शिता से भविष्य मे ऊर्जा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए परियोजना तैयार करता है। इसके लिए पूंजी के साथ-साथ नवीनतम तकनीकी के रिसर्च और परियोजनाओं को समय पर पूर्ण करने में जी-जान लगा दी जाती है। भारत सरकार इस मामले में चीन के मुकाबले कहीं खड़ी हुई नजर नहीं आती है। आज जिस तरह से ऊर्जा का संकट देखने को मिल रहा है, यदि हम अपने संसाधनों का सही इस्तेमाल करना शुरू कर दें, तो हम अपनी ऊर्जा की जरूरतों को भारत में भी बड़ी हद तक पूरा कर सकते हैं। भारत सरकार ने जो नियम कानून का मकडजाल बिछा कर रखा हुआ है, उसको साफ करते हुए यदि प्राथमिकता के साथ ऊर्जा संकट से निपटने के लिए हम वैकल्पिक संस्था संसाधनों की ओर काम करेंगे, तो कुछ ही वर्षों में काफी हद तक हम अपनी ऊर्जा जरूरतों को स्वयं पूरा कर पाएंगे। डाईअमोनिया फास्फेट के लिए अमोनिया जरूरी होता है। भारत अमोनिया का अभी बडी मात्रा में आयात कर रहा है। देश में इसकी भारी कमी है, जिसके कारण किसानों को समय पर खाद नहीं मिल पा रही है। वहीं भारत सरकार को इसके लिए विदेशी मुद्रा भी बड़े पैमाने पर खर्च करनी पड़ रही है। चीन द्वारा दुनिया की पूरी जरूरत का 40 फ़ीसदी यूरिया, कोयले से हासिल किए जाने वाली सिंथेटिक गैस के द्वारा उत्पादित की जा रही है। इसके अलावा चीन दुनिया की जरूरत के मिथानोल का 54 फ़ीसदी उत्पादन कर पा रहा है। चीन हर उस चीज में निवेश कर रहा है, जिसमें चीन का आयात कम हो, निर्यात में वृद्धि हो। कोयले का जितना अच्छा उपयोग चीन कर पा रहा है, भारत के पास पर्याप्त कोयले का भंडार होने के बाद भी हम अच्छी तरह से उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। परंपरागत रूप से अभी भी कोयला का उपयोग भारत पावर प्लांट को चलाने और औद्योगिक जरूरतों के लिए कर रहा है। भारत सरकार को इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। भारत सरकार को तकनीकी के विकास की ओर भी ध्यान देना होगा। समय पर सारे कार्य हों। इस दिशा में कार्य किया गया, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में विदेशी निर्भरता में भारी कमी आ सकती है। ईएमएस / 10 अप्रैल 26