लंबे समय से साहब के चेले का मन सादी दाल खाकर उचाटे लेकर, संन्यासी हो रहा था, उसने डरते डरते पत्नी से बघारी हुई दाल परोसने का आग्रह विनम्रता पूर्वक किया। पत्नी के लाल फैले हुए चक्षुओं से भयभीत हो , स्वयं को समेटते हुए चेले ने लगभग घिघियाते हुए दाल बघारने में श्रद्धा शब्द का संशोधन करते हुए, समय एवं सामग्री की उपलब्धता और श्रद्धानुसार ही बघारी दाल परोसने का पुनः आग्रह का प्रयास किया आती हुई संक्रांति की कुनकुनी धूप की तरह तनिक सी पिघली धर्मपत्नी ने यथासंभव बघारी दाल परोसकर विजयी मुस्कान के साथ किटी पार्टी की ओर बिना अनुमति रुख किया। घर में होती दैनिक दुर्दशा के परे बघारी दाल के चटखारे लेकर प्राप्त उर्जा से अपने दिन को आलोकित करने चेले भाई, अपने ठीहा पर पहुंच कर साहब के कदमों में दंडवत हुए। उन्होंने अंगूठे के नाखून का स्पर्श कर स्वयं को कृतार्थ किया और अपने वैज्ञानिक नजरिए से पेशीय बल द्वारा साहब की पेशियों का अंगुलियों से मसलन आरंभ किया, यहां स्मरण रहे पेशीय बल एवं गति के साथ मुखारविंद से अमूल नवनीत का झरना भी द्रुतगति से गतिमान था। हाथ ज्योंही घुटने पर पहुंचे बुद्धि का ज्वालामुखी फट पड़ा। हुजूर, आपके कार्यों की संख्या से सारा गांव पटा पड़ा है, किन्तु आज तो सभी वाह-वाह में है लेकिन लंबे समय की वाह की गारंटी पीरियड कब वारंटी में बदल जाये पता नहीं। कोई अविस्मरणीय प्रयास हो तो काम के साथ नाम भी अमिट रहे, मेरे भतीजे की नई दुकान में शिलालेख नूतन तकनीक से बन रहे हैं कहें तो बात चलाऊं। किन्तु साहब मेरी सोच है किये दो प्रकार से बनें, एक में नाम बड़ा, किसी में काम बड़ा। हुजूर पब्लिक आब्जेक्शन करें तो कहिएगा लोगों ने नाम बड़ा का बनवाया था लेकिन साहब ने कहा किसी काम बड़ा होता है नाम नहीं इसलिए काम बड़ा का बनवाया। इस तरह गांव में दोनों प्रकार से नाम होगा , सहृदयता का भी प्रसार होगा कि साहब काम को नाम से बड़ा मानते हैं। चेले की छोंक बघार से मन ही मन स्वाद बदलते साहब का मन प्रफुल्लित था, चेला आज की ड्यूटी पर आनंदित था। (आशुतोष तिवारी*वरिष्ठ साहित्यकार- जबलपुर) ईएमएस / 10 अप्रैल 26