कुवैत,(ईएमएस)। कुवैत में अमेरिकी सैन्य बेस पर हुए कथित ड्रोन हमले को लेकर सामने आई रिपोर्टों और सैनिकों की गवाही ने घटना को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक इंटरव्यू में हमले में जीवित बचे अमेरिकी सैनिकों ने दावा किया है कि इस हमले को रोका जा सकता था और उन्हें जानबूझकर एक असुरक्षित स्थिति में भेजा गया था। रिपोर्ट के अनुसार, हमला तब हुआ जब ईरान और इजरायल के बीच तनाव अपने चरम पर था। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने पहले कहा था कि एक “स्कर्टर” ड्रोन कुवैत स्थित एक किलेबंद सैन्य बेस की सुरक्षा प्रणाली को भेदकर अंदर घुस आया। लेकिन घायल और बचे हुए सैनिकों का कहना है कि यह दावा पूरी तरह गलत है। उनका कहना है कि बेस पर आधुनिक हवाई सुरक्षा प्रणाली मौजूद ही नहीं थी और वे बेहद सीमित सुरक्षा के बीच तैनात थे। सैनिकों ने बताया कि जिस स्थान पर उन्हें रखा गया था, वह कोई मजबूत किला नहीं बल्कि एक पुराना और कमजोर सैन्य ढांचा था, जिसमें केवल क्रांकीट बैरियर और कुछ अस्थायी संरचनाएँ थीं। ये संरचनाएँ केवल रॉकेट या मोर्टार हमलों से बचाव के लिए बनाई गई थीं, लेकिन ड्रोन जैसे आधुनिक हवाई खतरों के खिलाफ पूरी तरह अप्रभावी थीं। कथित रूप से 60 सैनिकों की यूनिट, जो 103वें सस्टेनमेंट कमांड का हिस्सा थी, को जानबूझकर ईरान के करीब शुआइबा बंदरगाह क्षेत्र के पास तैनात किया गया था। सैनिकों का दावा है कि इससे पहले अधिकतर अमेरिकी सैनिकों को जॉर्डन और सऊदी अरब जैसे सुरक्षित क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया गया था, लेकिन इन्हें जोखिम वाले क्षेत्र में रखा गया। 2 मार्च की घटना का वर्णन करते हुए सैनिकों ने बताया कि पहले सायरन बजा और उन्हें बंकर में भेजा गया, लेकिन कुछ ही समय बाद “ऑल-क्लियर” घोषित किया गया। लगभग आधे घंटे बाद अचानक एक शक्तिशाली धमाका हुआ, जिसे कथित रूप से ईरानी ड्रोन हमले के रूप में देखा गया। इस हमले में 6 सैनिकों की मौत और लगभग 20 के घायल होने की बात सामने आई है। सैनिकों ने इस घटना को बेहद भयावह बताया और कहा कि विस्फोट के बाद चारों ओर धूल, धुआं और अराजकता फैल गई थी। आशीष दुबे / 11 अप्रैल 2026