ईरान की दो टूक... इजराइल हमले रोके तभी वार्ता! -अमेरिका और इजराइल चाह रहे इजराइली प्रधानमंत्री लेबनान पर कर दें हमला बंद -अगर खाड़ी में युद्ध रूका तो नेतन्याहू के खिलाफ इजराइल में शुरू हो जाएगी बगावत इस्लामाबाद/तेल अवीवी/तेहरान/वाशिंगटन(ईएमएस)। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका, ईरान और पाकिस्तान के बीच जब अहम त्रिपक्षीय बातचीत चल रही थी, उस दौरान इजराइल और हिजबुल्लाह के एक दूसरे पर हमले कर रहे थे। इससे सीजफायर के बाद मिडिल ईस्ट में शांति कायम रखने की कोशिशों पर इसका असर पड़ सकता है। दरअसल, अमेरिका और ईरान दोनों चाहते हैं कि मिडिल ईस्ट में युद्ध रूके। इसके लिए दोनों चाहते है कि किसी भी तरह इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को मनाया जाए की वे लेबनान पर हमला न करें। उधर, नेतन्याहू जानते हैं कि अगर युद्ध रूका तो इजराइल में उनके खिलाफ बगावत शुरू हो जाएगी। इसलिए हिजबुल्लाह की आड़ में वे युद्ध जारी रखना चाहते हैं। उधर, ईरान ने साफ कर दिया है कि इजराइल हमले रोके तभी वार्ता संभव है। सूत्रों के मुताबिक, इस वार्ता में युद्ध को पूरी तरह खत्म करने, होर्मुज स्ट्रेट को लेकर सहमति बनाने और आगे के सुरक्षा ढांचे पर चर्चा की जा रही है। राउंड टेबल मीटिंग में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जेयर्ड कुशनर; ईरान के बाकर गालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और पाकिस्तान की तरफ से आसिम मुनीर शामिल रहे। उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने तेल आपूर्ति पर जोर देते हुए कहा कि दुनिया के बड़े समुद्रों में जहाजों को देखिए, उनमें से कई अमेरिका की ओर तेल लोड करने के लिए आ रहे हैं, हमारे पास इसकी कोई कमी नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर उन्होंने भरोसा जताया और कहा कि होर्मुज स्ट्रेट बहुत दूर नहीं, जल्द ही खुल जाएगा। हालांकि, ईरान पर निशाना साधते हुए ट्रंप ने उसे एक विफल देश बताया। जब उनसे पूछा गया कि क्या ईरान ईमानदारी से बातचीत कर रहा है, तो उन्होंने कहा कि मैं आपको बहुत जल्द बता दूंगा, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा। बातचीत फेल हुई तो अमेरिका भी जिम्मेदार ईरान ने साफ कहा है कि अगर इस्लामाबाद में चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती है, तो सिर्फ इजराइल को दोष नहीं दिया जा सकता। ईरान का कहना है कि कुछ लोग यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि इजराइल अलग से इस प्रोसेस में बाधा डाल रहा है, जबकि उनके मुताबिक इजराइल और अमेरिका के फैसले आपस में जुड़े हुए हैं। इसलिए अगर बातचीत फेल होती है तो उसकी जिम्मेदारी अमेरिका पर भी होगी। गौरतलब है कि 47 साल पहले यानी 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार है जब दोनों देश इतने बड़े स्तर पर आमने-सामने बातचीत कर रहे हैं। इससे पहले ईरान ने कहा था कि अगर इस्लामाबाद में चल रही बातचीत किसी नतीजे पर नहीं पहुंचती, तो सिर्फ इजराइल को दोष नहीं दिया जा सकता। इजराइल और अमेरिका के फैसले जुड़े हैं, इसलिए वार्ता फेल होने पर जिम्मेदारी अमेरिका पर भी होगी। यूरोप में जेट फ्यूल की कमी का खतरा मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब यूरोप तक पहुंचता दिख रहा है। मीडिया रिपोट्र्स के मुताबिक अगर अगले तीन हफ्तों में होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता ठीक से नहीं खुला, तो यूरोप में जेट फ्यूल की भारी कमी हो सकती है। इसका सीधा असर फ्लाइट्स पर पड़ेगा। उड़ानें कम हो सकती हैं, टिकट महंगे हो सकते हैं और इससे यूरोप की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो सकता है, खासकर उस समय जब गर्मियों का सीजन शुरू होने वाला है। इजराइल और हिजबुल्लाह के एक दूसरे पर हमले जारी लेबनान में अभी भी हालात लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। हिजबुल्लाह ने दावा किया है कि उसने इजराइली ठिकानों और सैनिकों को निशाना बनाते हुए रॉकेट, ड्रोन और मिसाइल से कई हमले किए हैं। इन हमलों में इजराइल के सैन्य ठिकानों, टैंकों और सैनिकों को निशाना बनाया गया है। जवाब में इजराइल भी लगातार हमले कर रहा है। दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान की बातचीत अभी साफ दिशा में जाती नहीं दिख रही है। दोनों पक्ष अलग-अलग उम्मीदों के साथ आए हैं और बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहे हैं। सबसे बड़ी दिक्कत दोनों के बीच भरोसे की कमी है। हालात तब और पेचीदा हो गए जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि अगर बातचीत सफल नहीं हुई तो मामला सैन्य कार्रवाई तक जा सकता है। इस बातचीत में ईरान ने दो बड़ी शर्तें सामने रखी हैं। पहली, लेबनान में जारी लड़ाई को रोका जाए। दूसरी शर्त है ईरान के जमे हुए अरबों डॉलर के फंड को रिलीज करना, जो 1979 से अलग-अलग देशों में फंसा हुआ है। हालांकि अमेरिका क्लियर कर चुका है कि वो ईरान के फंड को रीलीज नहीं करेगा। अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने जर्मनी के समकक्ष योहान वाडेफुल से फोन पर कहा कि ईरान को अमेरिका पर बिल्कुल भरोसा नहीं है। मेहर न्यूज एजेंसी के मुताबिक उन्होंने कहा कि ईरानी डेलिगेशन को होने वाली बातचीत पर भी यकीन नहीं है। अराघची ने कहा कि अमेरिका ने बार-बार अपने वादे तोड़े हैं और कूटनीति के साथ विश्वासघात किया है। यही वजह है कि ईरान उस पर भरोसा नहीं करता। उन्होंने कहा कि सरकार ईरानी जनता के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताकत से लड़ेगी। विनोद उपाध्याय / 11 अप्रैल, 2026