-एसआईआर और एडजुडिकेशन की वजह से बंगाल मतदाता सूची में जेरिमैंडरिंग? कोलकाता,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया चल रही है। इसमें पुरानी सूची की जांच होती है और गलत, मृत या दोहरे नाम वाले वोटरों को हटाया जाता है। इस बार इस प्रक्रिया में एक खास एडजुडिकेशन यानी न्यायिक निर्णय वाला स्टेप जोड़ा गया है। इसके तहत स्थानीय अधिकारी हर नाम की दोबारा जांच करते हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या इस एसआईआर और एडजुडिकेशन की वजह से राज्य की मतदाता सूची में जेरिमैंडरिंग हो गया है? जेरिमैंडरिंग का मतलब होता है वोटरों की संख्या या जगह को इस तरह बदलना कि किसी खास पार्टी को फायदा हो। आसान भाषा में कहें तो- चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि मुस्लिम बहुल इलाकों और विधानसभा क्षेत्रों में वोटर हटाने की संख्या ज्यादा थी। मुस्लिम वोटर आमतौर पर बीजेपी को कम वोट देते हैं और टीएमसी या कांग्रेस को ज्यादा वोट देते हैं। इसलिए अगर मुस्लिम वोटर ज्यादा हटे तो बीजेपी को फायदा हो सकता है। पहले बिहार में एसआईआर हुआ था। एसआईआर में जो लोग हटाए गए, वे ज्यादातर मृतक, माइग्रेट यानी अन्य जगह चले गए या दोहरी रजिस्ट्री वाले थे। इन्हें “डेडवुड” कहते हैं। हमने कहा था कि एसआईआर के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ेगा। बिहार के 2025 चुनाव में ठीक यही हुआ। केरल और असम में भी एसआईआर या स्पेशल रिवीजन के बाद टर्नआउट बढ़ा। अब पश्चिम बंगाल में भी अभी जो कुल वोटर लिस्ट में बचे हैं, उनकी संख्या 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट डालने वाले लोगों की कुल संख्या से काफी ज्यादा है यानी यह सच है कि एसआईआर के बाद कुल मतदाताओं की संख्या में गिरावट के बावजूद यह संख्या अभी भी 2024 के लोकसभा चुनाव में पड़े कुल वोटों से ज्यादा है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आगामी विधानसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ता है, तो कुल वोटों की संख्या में कमी नहीं आएगी। लेकिन यहां चुनौती यह है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में जहां मतदान 81.7फीसदी था, वहीं 2026 में इसे लगभग 88.9फीसदी तक पहुंचाना होगा, जो अपने आप में एक बड़ा लक्ष्य है। कई सीटें ऐसी हैं जहां मतदाताओं और पिछले चुनाव में पड़े वोटों के बीच अंतर बहुत कम है, ऐसे में थोड़ी सी गिरावट भी कुल मतदान को प्रभावित कर सकती है। 10 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक एडजुडिकेशन यानी दोबारा जांच के दौरान वोटर हटाने का पैटर्न पहले एसआईआर से भी ज्यादा तिरछा था। 2011 से अब तक कम से कम एक मुस्लिम विधायक चुनने वाली 67 विधानसभा सीटों पर नाम कटने की दर सबसे ज्यादा रही है। यही ट्रेंड उन 16 सीटों पर भी देखा गया है जहां मतुआ समुदाय का प्रभाव है। इनमें से 9 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। मतुआ समुदाय बांग्लादेश से आए दलित समूहों का संगठन है। तीन सीटें ऐसी हैं जहां 2026 के कुल वोटर 2024 के मुकाबले कम हो गए हैं। ये हैं- दक्षिण 24 परगना की मेटियाबुरुज जो टीएमसी का गढ़ और मुर्शिदाबाद की लालगोला और शमशेरगंज जो कांग्रेस का गढ़ है। यह रुझान इस बात की ओर इशारा करता है कि कुछ विशेष सामाजिक समूहों वाले इलाकों में मतदाता सूची का संशोधन समान रूप से नहीं हुआ। हालांकि, इन क्षेत्रों में अन्य समुदायों के मतदाता भी मौजूद हैं, इसलिए इसे पूरी तरह एकतरफा कहना भी सही नहीं है। इस पूरे मुद्दे को जेरिमैंडरिंग यानी चुनावी हेरफेर के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगा, क्योंकि धर्म या समुदाय के आधार पर मतदाता सूची का पूरा और स्पष्ट डेटा उपलब्ध नहीं है। इसलिए जो भी निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं, वे संभावनाओं और रुझानों पर आधारित हैं, न कि ठोस प्रमाणों पर। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि हटाए गए नामों में वे लोग शामिल हो सकते हैं जो या तो अब जीवित नहीं हैं, स्थानांतरित हो चुके हैं या एक से ज्यादा जगहों पर पंजीकृत थे, यानी मतदाता सूची को ज्यादा सटीक बनाने की प्रक्रिया के तहत यह बदलाव हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत अपेक्षाकृत कम था, जबकि मतुआ प्रभाव वाले क्षेत्रों में ज्यादा रहा। इससे दो तरह की व्याख्याएं होती हैं- एक, यह कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मतदाता सूची में ‘डेडवुड’ यानी गैर-प्रभावी नाम अधिक हो सकते थे, दूसरा, यह कि वहां मतदाताओं में मतदान के प्रति उत्साह अपेक्षाकृत कम था। अब जब इन क्षेत्रों में अपेक्षाकृत ज्यादा नाम हटे हैं, तो यह भी संभव है कि आगामी चुनाव में इन समुदायों के मतदाता ज्यादा सक्रिय होकर मतदान करें। रिपोर्ट के मुताबिक कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में एसआईआर और एडजुडिकेशन की प्रक्रिया ने चुनावी परिदृश्य को जटिल बना दिया है। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े कुछ संकेत जरूर देते हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष चुनाव के बाद ही सामने आएंगे, जब सीटवार मतदान और परिणामों का विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा। अभी के लिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि इस प्रक्रिया ने सवाल जरूर खड़े किए हैं, लेकिन इसे सीधे तौर पर चुनावी हेरफेर करार देना अभी तथ्यों के आधार पर संभव नहीं है। सिराज/ईएमएस 12 अप्रैल 2026