लेख
12-Apr-2026
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(13 अप्रैल दिवस विशेष आलेख) भारतीय इतिहास में 13 अप्रैल का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ अत्यंत पीड़ादायक भी है। यह दिन जलियांवाला बाग हत्याकांड के रूप में स्मरण किया जाता है, जो ब्रिटिश शासन की क्रूरता का भयावह उदाहरण है। 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर स्थित जलियांवाला बाग में निहत्थे और निर्दोष लोगों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर सैकड़ों लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई। इस घटना की पृष्ठभूमि में रॉलेट एक्ट था, जिसे काला कानून कहा गया, क्योंकि इसके तहत बिना मुकदमे के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार सरकार को मिल गया था। इस अन्यायपूर्ण कानून का पूरे देश में विरोध हुआ। अमृतसर में लोकप्रिय नेताओं सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल ने इसका कड़ा विरोध किया और लोगों को संगठित किया। यहां पाठकों को बताता चलूं कि सैफुद्दीन किचलू का जन्म 1888 में अमृतसर में हुआ था; वे एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, वकील और राष्ट्रवादी नेता थे तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े थे। वहीं, डॉ. सत्यपाल भी अमृतसर के प्रसिद्ध चिकित्सक और स्वतंत्रता सेनानी थे, जो कांग्रेस से जुड़े हुए थे और शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। 10 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश सरकार ने दोनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, जिससे जनता में भारी आक्रोश फैल गया और विरोध प्रदर्शन तेज हो गए। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का पर्व था, इसलिए लगभग 10,000 पुरुष, महिलाएँ और बच्चे जलियांवाला बाग में एकत्र हुए। कुछ लोग राजनीतिक सभा के लिए आए थे, जबकि कई लोग मेले के कारण वहाँ पहुँचे थे। उस समय जलियांवाला बाग कोई व्यवस्थित बगीचा नहीं था, बल्कि चारों ओर मकानों से घिरा एक बड़ा खुला मैदान था, जिसमें आने-जाने के लिए केवल एक संकरा प्रवेश मार्ग था और चारों ओर ऊँची दीवारें थीं। सभा की सूचना मिलते ही ब्रिटिश अधिकारी रेजिनाल्ड डायर लगभग 90 सैनिकों के साथ वहाँ पहुँचा। उसके साथ दो मशीनगनों से लैस बख्तरबंद गाड़ियाँ भी थीं, जो संकरे मार्ग के कारण भीतर नहीं जा सकीं। डायर ने बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैनिकों ने लगभग 10 मिनट तक लगातार गोलीबारी की और लगभग 1650 गोलियाँ चलाईं; गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक गोला-बारूद लगभग समाप्त नहीं हो गया। सैनिकों ने सभी निकास मार्गों को घेर लिया था, जिससे लोग भाग नहीं सके और सैकड़ों लोग वहीं मारे गए। अपनी जान बचाने के लिए कई लोग बाग में स्थित एक कुएँ में कूद गए, जहाँ से बाद में 100 से अधिक शव निकाले गए; यह स्थान आज ‘शहीदी कुआँ’ के रूप में सुरक्षित स्मारक है। मृतकों की संख्या को लेकर विभिन्न आँकड़े मिलते हैं।ब्रिटिश सरकारी अभिलेखों के अनुसार 379 लोग मारे गए और लगभग 200 घायल हुए; अमृतसर डिप्टी कमिश्नर कार्यालय की सूची में 484 शहीदों का उल्लेख मिलता है; जलियांवाला बाग की सूची में 388 शहीद दर्ज हैं; जबकि भारतीय अनौपचारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और लगभग 2000 घायल हुए। ब्रिटिश अभिलेखों में मृतकों में 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक छह सप्ताह का शिशु शामिल था। घटना के बाद अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया गया और घायलों को अस्पताल ले जाने की अनुमति तक नहीं दी गई, जिसके कारण कई लोग रातभर तड़पते हुए मर गए। इसके बाद पूरे क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू कर दिया गया और जनरल डायर ने कई कठोर आदेश लागू किए, जिनमें ‘क्रॉलिंग ऑर्डर’ सबसे कुख्यात था, जिसके तहत एक गली से गुजरने वाले भारतीयों को पेट के बल रेंगकर गुजरने के लिए मजबूर किया जाता था; इसके अतिरिक्त अनेक स्थानों पर लोगों को सार्वजनिक रूप से कोड़े भी लगाए गए। इस घटना(जलियांवाला बाग हत्याकांड) की देश-विदेश में तीव्र निंदा हुई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश शासन की आलोचना हुई। दबाव में आकर ब्रिटिश सरकार ने हंटर आयोग का गठन किया। आयोग के समक्ष डायर ने स्वीकार किया कि उसने पहले से ही लोगों को सबक सिखाने का निर्णय ले लिया था और वह बख्तरबंद गाड़ियों के साथ आया था, जो संकरे मार्ग के कारण भीतर नहीं लाई जा सकीं। आयोग की रिपोर्ट के बाद 1920 में डायर को पदावनत कर कर्नल बना दिया गया, उसे भारत में कोई पद न देने का निर्णय लिया गया और अंततः उसे ब्रिटेन वापस भेज दिया गया। ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स ने इस घटना की निंदा की, जबकि हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने प्रारंभ में उसका समर्थन किया, जो ब्रिटिश इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय माना जाता है। इस घटना से आहत होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ की उपाधि लौटा दी, वहीं महात्मा गांधी ने ‘केसर-ए-हिंद’ सम्मान वापस कर 1 अगस्त 1920 को असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, जो अंग्रेजी शासन के विरुद्ध अहिंसक प्रतिरोध का व्यापक अभियान था। गांधीजी ने रॉलेट एक्ट के विरोध में सत्याग्रह का मार्ग अपनाया था। इस घटना का एक अन्य महत्वपूर्ण प्रभाव यह रहा कि ऊधम सिंह, जो इस हत्याकांड के प्रत्यक्षदर्शी थे, ने प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया और 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में माइकल ओड्वायर की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया, मुकदमा चला और 31 जुलाई 1940 को पेंटनविल जेल में फाँसी दे दी गई। इस प्रकार, जलियांवाला बाग हत्याकांड केवल एक दुखद घटना नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक निर्णायक मोड़ था, जिसने देशवासियों के मन में स्वतंत्रता की ज्वाला को और अधिक प्रज्वलित कर दिया तथा अंग्रेजी शासन के अंत की नींव को मजबूत किया। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 12 अप्रैल 26