राष्ट्रीय
12-Apr-2026
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मुंबई, (ईएमएस)। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा और कानून की सीमाओं को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि ऑफिस में महिला सहकर्मी को घूरकर देखना नैतिक रूप से गलत और आपत्तिजनक हो सकता है, लेकिन इसे भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 354सी के तहत ‘वॉययूरिज्म’ (Voyeurism) नहीं माना जा सकता। यह फैसला मैक्स लाइफ इंश्योरेंस कंपनी के कर्मचारी अभिजीत निगुडकर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करते हुए दिया गया। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अमित बोरकर की एकल पीठ ने की। अदालत ने अपने फैसले में ‘नैतिकता’ और ‘कानूनी अपराध’ के बीच के अंतर को स्पष्ट किया। * क्या था मामला? एक निजी बीमा कंपनी में काम करने वाली महिला कर्मचारी ने अपने वरिष्ठ सहकर्मी पर आरोप लगाया था कि वह ऑफिस में बातचीत के दौरान उसकी आंखों में देखने के बजाय बार-बार उसकी छाती की ओर घूरता था। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी द्वारा की गई टिप्पणियों से वह असहज और असुरक्षित महसूस करती थी। कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) ने इस मामले की जांच की, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण आरोपी को क्लीन चिट दे दी। इसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा और आरोपी के खिलाफ बीएनएस की धारा 354सी (वॉययूरिज्म) के तहत केस दर्ज किया गया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 354सी केवल उन स्थितियों में लागू होती है, जब किसी महिला के “निजी क्षणों” में चोरी-छिपे देखना या रिकॉर्ड करना शामिल हो-जैसे कपड़े बदलना या बाथरूम का उपयोग करना। ऑफिस या कार्यस्थल को “निजी स्थान” की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्योंकि वहां महिला कोई निजी क्रिया नहीं कर रही होती। इसलिए केवल घूरकर देखना इस धारा के दायरे में नहीं आता। न्यायमूर्ति अमित बोरकर ने कहा कि किसी भी व्यवहार को अपराध मानने के लिए कानून में तय शर्तों का पूरा होना जरूरी है। उन्होंने माना कि आरोपी का व्यवहार अनुचित और पेशेवर माहौल के खिलाफ था, लेकिन इसे कानून के तहत ‘वॉययूरिज्म’ नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि: ऐसा व्यवहार “प्रोफेशनल मिसकंडक्ट” की श्रेणी में आ सकता है। कंपनियों के आंतरिक नियमों या कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून के तहत कार्रवाई संभव है। बहरहाल हाई कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब कार्यस्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर बहस तेज है। हाई कोर्ट ने साफ किया कि हर अनैतिक काम कानूनन अपराध नहीं होता, और अदालत को केवल कानून की निर्धारित सीमाओं के भीतर ही निर्णय देना होता है। संजय/संतोष झा-१२ अप्रैल/२०२६/ईएमएस