कोरबा (ईएमएस) छत्तीसगढ़ की सियासत में इन दिनों कोरबा जिला एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। बताया जा रहा हैं की पूर्व सांसद और बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुश्री सरोज पांडेय द्वारा आयोजित कार्यक्रम ‘बचपन की टिकट’ बहुत ज्यादा सफल हुआ हैं। राजनीति के विश्लेषकों का मानना हैं की कागजों में यह आयोजन भले ही सांस्कृतिक और सामाजिक बताया गया हैं, लेकिन इसके सियासी मायने खुलकर सामने आ रहे हैं। * सांस्कृतिक मंच, लेकिन सियासी संकेत साफ कोरबा अंचल की अशोक वाटिका में आयोजित इस कार्यक्रम में हजारों की संख्या में महिलाओं और विद्यालयीन छात्राओं ने भाग लिया। पारंपरिक खेलों, सांस्कृतिक गतिविधियों और उत्साहपूर्ण माहौल ने इसे एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप दे दिया। लेकिन मंच पर उनकी मौजूदगी और मैदान में दिखी सक्रियता ने इसे पूरी तरह सियासी रंग दे दिया। कैबिनेट मंत्री लखनलाल देवांगन की उपस्थिति, कोरबा और बिलासपुर महापौर द्वय की सक्रिय भागीदारी और बीजेपी संगठन के पदाधिकारियों की भीड़ ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। भले ही सुश्री सरोज पांडेय ने मीडिया से बातचीत के दौरान इस आयोजन को गैर राजनीतिक बताया हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे अलग नजरिए से देखा जा रहा है। राजनीति के विश्लेषकों का मानना है कि यह आयोजन एक सुनियोजित जनसंपर्क अभियान था, जो आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी का हिस्सा हो सकता है। इस आयोजन के बाद हालांकि आयोजन के संबंध में कोई स्पष्ट अधिकृत जानकारी नहीं दी गयी हैं किंतु राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ियो ने आयोजन पश्चात बताया की बीजेपी के भीतर एक अजीब ही हलचल तेज हो गई है। खासकर उन नेताओं के बीच, जो आगामी चुनावों में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ‘बचपन की टिकट’ नाम भले ही मासूम लगे, लेकिन इसके पीछे छिपा सियासी संदेश कई नेताओं की धड़कनें बढ़ा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के जरिए जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना और संगठन में अपनी सक्रियता दिखाना, टिकट की दौड़ में बढ़त दिला सकता है। भारतीय राजनीति में अक्सर संदेश सीधे शब्दों में नहीं, बल्कि आयोजनों और गतिविधियों के जरिए दिए जाते हैं। कोरबा का यह कार्यक्रम भी कुछ ऐसा ही संकेत दे गया है कि चुनावी मैदान की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। 13 अप्रैल / मित्तल