नई दिल्ली (ईएमएस)। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ते तनाव ने वैश्विक स्तर पर गंभीर चिंताएँ पैदा कर दी हैं। अमेरिका और ईरान के बीच 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता विफल होने के बाद स्थिति और जटिल हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी नौसेना ने ईरानी बंदरगाहों पर “टोटल मैरीटाइम ब्लॉकेड” लागू किया है। यह कदम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक को प्रभावित करता है, जहां से लगभग 20 प्रतिशत वैश्विक तेल आपूर्ति होती है। इस कारण न केवल तेल की कीमतों में तेज उछाल का खतरा है, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। इस बार की स्थिति पिछले खाड़ी युद्धों से अलग है, क्योंकि अमेरिका को व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिल रहा। नाटो के कई प्रमुख देश जैसे स्पेन, जर्मनी और इटली सैन्य कार्रवाई से दूरी बना रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी इस कदम को मंजूरी नहीं मिली, क्योंकि रूस और चीन ने वीटो किया। केवल इजराइल और यूएई ही अमेरिका के साथ खड़े नजार आ रहे हैं। इससे अमेरिका पर आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ गया है। जहां चीन और रूस संकट को अमेरिका के प्रभाव को कमजोर करने के मौके के रूप में देख रहे हैं। चीन, जो मध्य पूर्व से भारी मात्रा में तेल आयात करता है, अपने हितों की रक्षा के लिए सैन्य तैनाती का संकेत दे चुका है। वहीं रूस यूरोप में अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है। दोनों देश उर्वरक आपूर्ति को नियंत्रित कर वैश्विक दबाव बना सकते हैं, जिससे भारत और ब्राजील जैसे देशों के सामने खाद्य सुरक्षा की चुनौती खड़ी हो सकती है। आर्थिक प्रभाव केवल तेल तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतें 130–150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। उर्वरक की कीमतों में भारी वृद्धि से कृषि प्रभावित होगी, इससे खाद्य संकट की आशंका है। शिपिंग बीमा महंगा होने से वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हो सकती है, और बैंकिंग सिस्टम में भी तरलता संकट पैदा हो सकता है। इस संकट के तीसरे विश्व युद्ध में बदलने की आशंका जाहिर की जा रही है। यदि ईरान पर दबाव बढ़ता है, तब वह परमाणु कार्यक्रम को तेज कर सकता है। साथ ही, हिजबुल्लाह और हूती जैसे सहयोगी समूह सक्रिय हो सकते हैं। साइबर हमलों का खतरा भी बढ़ गया है, जो वैश्विक वित्तीय और ऊर्जा प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है। भारत पर इसका सीधा असर पड़ सकता है, क्योंकि वह कच्चे तेल के लिए खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर है। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ेगी और आम लोगों पर बोझ पड़ेगा। उर्वरक महंगे होने से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हालांकि भारत ने अभी तटस्थ रुख अपनाया है, लेकिन लंबा संकट होने पर भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और रणनीतिक भंडार का उपयोग करना पड़ेगा। कुल मिलाकर, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का यह संकट केवल क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। ऐसी स्थिति में सतर्क कूटनीति और आर्थिक तैयारी ही देशों को इस संभावित संकट से बचा सकती है। आशीष दुबे / 14 अप्रैल 2026