नई दिल्ली (ईएमएस)। वहां जमाना बीत गया, जब किसी देश पर हमला करने के लिए सैनिकों की टुकड़ी भेजी जाती थी। आज के समय में जंग मिसाइल, फाइटर जेट और ड्रोन से लड़ी जाती है। लेकिन आधुनिक जंग में दुश्मन पर लड़ाकू विमान, मिसाइल और ड्रोन से हमला करने से भी ज्यादा जरूरी होता है, उसके हमलों से खुद को बचाना। दुनिया के ज्यादातर देश या आधुनिक रडार सिस्टम तैयार कर रहे हैं या फिर उन्हें खरीदकर अपनी सेना में शामिल कर रहे हैं। भारतीय वायु सेना (आईएएफ) भी बेहद आधुनिक और लंबी दूरी तक निगरानी रखने में सक्षम रडार (एलआरएसआर) खरीद रही है। ये रडार उन सिस्टमों की जगह ले सकते हैं, जिन्हें भारत 1970 के दशक से इस्तेमाल कर रहा है। वायुसेना को एक मोबाइल गाड़ी में माउंटेड सिस्टम चाहिए, जो बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ-साथ फाइटर जेट और ड्रोनों का पता लगाकर उन्हें ट्रेक कर सके। रडार का क्रास सेक्शन कम होना चाहिए, यानी वह हवा में चली आ रही ज्यादातर मशीन को डिटेक्ट कर ले। इसकी स्पीड तेज होनी चाहिए। साथ ही 450 किलोमीटर से ज्यादा दूरी पर और 40 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर उड़ते मिसाइल या ड्रोन का भी पता लगा ले। यानी इस्लामाबाद से कोई ड्रोन या मिसाइल लांच होने पर भारत की धरती से डिटेक्ट किया जा सके। वायुसेना की तरफ से जारी रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन (आरएफआई) के मुताबिक यह सिर्फ भारतीय संस्थाओं के लिए ही है। इसमें मुख्य रडार के अलावा, ड्रोन का पता लगाने के लिए मुख्य एंटीना वाहन पर ही एक एक्स-बैंड रडार भी होना चाहिए, जिसके साथ एक साझा या एकीकृत डिस्प्ले भी होना चाहिए। ये तकनीक इसलिए जरूरी है, क्योंकि 2025 में पाकिस्तान के साथ टकराव में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिसाइलें और ड्रोन ही सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जा रहे थे। भारतीय वायुसेना जिस तरह का रडार चाहती है, उसमें अहम शर्त यह है कि वह जेएन टेक्नोलॉजी पर आधारित हो। दरअसल, जेएन (गैलियम नाइट्राइड) एक उन्नत सेमीकंडक्टर मिश्रण है, जो पारंपरिक सिलिकॉन की जगह लेता है। इससे छोटे, तेज और ज्यादा कुशल पावर डिवाइस बनाना संभव होता है। इसकी कई खासियतें हैं, जैसे उच्च-पावर दक्षता, कम गर्मी पैदा होना और उच्च-आवृत्ति स्विचिंग। इसकारण यह कॉम्पैक्ट, उच्च-पावर वाले चार्जर, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा प्रणालियों के लिए एकदम सही है। ऐसा नहीं है कि जेएन टेक्नोलॉजी एकदम नई है। इस तकनीक को सबसे पहले 1932 में ही विकसित कर लिया गया था, लेकिन 2000 के दशक के मध्य में ही इसका कारोबारी कारण शुरू हुआ और 2018 के बाद से इसका इस्तेमाल बढ़ा। 2023 में भारत इस अत्यधिक प्रतिबंधित तकनीक को विकसित करने वाला सातवां देश बन गया। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) ने रक्षा संबंधी उपयोगों के लिए जेएन चिप्स का उत्पादन किया। अभी सेवा में मौजूद सबसे लंबी रेंज वाला रडार हाई पावर स्टैटिक रडार है, जिसे फ्रांस की कंपनी थामसन-सीएसएफ ने डेवलप किया है। इस रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनी भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) ने बनाया है। इस रडार की पहुंच 430 किलोमीटर की दूरी और 75,000 फीट की ऊंचाई तक है। इस राडर सिस्टम को 1976 में सेना में शामिल किया गया था। वायुसेना ने 2025 में डीआरडीओ से डेवलप हुए सूर्य एंटी-स्टेल्थ रडार को अपने बेड़े में शामिल करना शुरू किया था। इसकी रेंज 360 किलोमीटर है। उसी साल आईएएफ ने 16 अरुद्र मीडियम पावर एईएसए रडार का भी ऑर्डर दिया। इनकी रेंज 400 किलोमीटर है। इन रडार को भी डीआरडीओ ने डेवलप और बीईएल ने बनाया है। इससे ठीक एक साल पहले लार्सन एंड टुब्रो को 12 स्टैटिक हाई पावर रडार का ऑर्डर मिला था। इनकी रेंज 400 किलोमीटर से ज्यादा है। आशीष दुबे / 14 अप्रैल 2026