लेख
18-Apr-2026
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नायक की बढ़ती क्रूरता युवाओं को प्रेरित करेगी या विचलित? फिल्में समाज का आईना हैं, जो जीवन के उतार-चढ़ाव, प्रेम, संवेदना, संघर्ष, नैतिकता और मानवीय मूल्यों का संतुलित चित्रण प्रस्तुत करती हैं। किंतु कुछ समय से यही आईना रक्तरंजित दृश्यों और नायक की क्रूरता से लाल होता जा रहा है। बदलते दौर में चलचित्रों का स्वरूप तेजी से परिवर्तित हुआ है और अब परदे पर नायक का चरित्र पारंपरिक आदर्शों से हटकर खलनायक से अधिक आक्रामक, प्रतिशोधी और हिंसक रूप में उभर रहा है। यह बदलाव केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समाज और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के मनोविज्ञान को गहराई से प्रभावित करने वाला है, क्योंकि युवा मन स्वभाव से अनुकरणीय होता है, जो अपने सामने प्रस्तुत आदर्शों और व्यक्तित्वों को सहज ही आत्मसात कर लेता है। जब फिल्मों में नायक को हिंसा के माध्यम से समस्याओं का समाधान करते हुए दिखाया जाता है और उस हिंसा को साहस, शक्ति तथा सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब यह संदेश युवाओं के मन में गहराई से स्थापित हो जाता है। परिणामस्वरूप वे वास्तविक जीवन में भी आक्रामकता को उचित मानने लगते हैं, जिससे सहिष्णुता, धैर्य और संवेदनशीलता जैसे मानवीय गुणों का क्षरण होने लगता है तथा समाज में असहिष्णुता और त्वरित प्रतिक्रिया की प्रवृत्ति बढ़ने लगती है। यह स्थिति सामाजिक संतुलन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। आज भारत में हिंसात्मक फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता का प्रमुख कारण बाज़ारवादी दृष्टिकोण है, जो एक बड़े व्यावसायिक उपक्रम के रूप में विकसित हो चुका है। फिल्म निर्माता अब दर्शकों की रुचि के अनुरूप ऐसे विषयों को प्राथमिकता देते हैं, जो अधिक से अधिक लोगों को आकर्षित कर सकें। फिल्मों में हिंसा, उत्तेजना, गाली-गलोच और रोमांच ऐसे तत्व हैं जो दर्शकों में त्वरित आकर्षण उत्पन्न करते हैं, इसलिए इन्हें अधिक महत्व दिया जाने लगा है। इसके अतिरिक्त, डिजिटल मंचों के विस्तार ने भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है, जहाँ पारंपरिक नियंत्रण के अभाव में अधिक स्वतंत्रता के साथ क्रूर और अवास्तविक हिंसा को प्रस्तुत किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अनेक फिल्मों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंसा पर आधारित कहानी भी व्यापक लोकप्रियता प्राप्त कर सकती है। जिनमें प्रमुख है एनिमल जिसमें नायक के उग्र और हिंसक रूप को प्रमुखता दी गई और उसे दर्शकों का व्यापक समर्थन भी मिला। इसी प्रकार किल में सीमित परिवेश के भीतर अत्यधिक क्रूर संघर्ष को प्रस्तुत कर तीव्र प्रभाव उत्पन्न किया गया। मार्को जैसी फिल्मों ने अपनी रक्तरंजित प्रस्तुति के कारण विशेष चर्चा प्राप्त की, जबकि हाल की धुरंधर और ओ रोमियो में भी रक्तरंजित हिंसक आक्रामकता और प्रतिशोध की भावना को प्रमुख स्थान दिया गया है। यह प्रवृत्ति केवल भारतीय सिनेमा तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व स्तर पर भी ऐसे चलचित्रों की संख्या और लोकप्रियता में वृद्धि हो रही है। वर्तमान परिस्थिति में चलचित्र प्रमाणन से संबंधित संस्था की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में यह दायित्व केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के पास है, जो फिल्मों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत करता है तथा आवश्यकतानुसार आपत्तिजनक दृश्यों में संशोधन भी कराता है। तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह व्यवस्था केवल औपचारिकता तक सीमित रह गई है या वास्तव में समाज के व्यापक हितों की रक्षा कर पा रही है। कई बार अत्यधिक हिंसात्मक दृश्यों को केवल वयस्कों के लिए उपयुक्त घोषित कर दिया जाता है, जबकि उनका अप्रत्यक्ष प्रभाव समाज और विशेषकर युवाओं पर ही पड़ता है। इसलिए यह विषय अधिक गंभीरता और उत्तरदायित्व की आवश्यकता को प्रकट करता है। आज हमें स्वीकार करना होगा कि फिल्में समाज का दर्पण हैं, जो केवल प्रतिबिंब ही प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि भावी पीढ़ी और समाज को दिशा भी देती हैं। फिल्मों में हिंसा का चित्रण यथार्थ के संदर्भ में सीमित रहे, तो वह समाज को जागरूक कर सकता है, किंतु जब वही हिंसा रक्तरंजित होकर मनोरंजन का प्रमुख साधन बन जाती है, तब वह चिंता का विषय बन जाती है। वर्तमान परिस्थितियाँ संकेत करती हैं कि यदि फिल्मों में दिखाई जाने वाले हिंसात्मक चित्रण में संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो यह प्रवृत्ति युवा पीढ़ी को प्रेरित करने की बजाय उसे विचलित और भ्रमित कर सकती है। इसलिए अब आवश्यक हो गया है कि भारतीय सिनेमा मनोरंजन के साथ-साथ अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का भी निर्वहन करे और ऐसी सामग्री प्रस्तुत करे, जो मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने में सहायक हो। ( लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 18 अप्रैल /2026