ऐसे लाखों लोग है, जो डाॅक्टर वही अच्छा, जो ज्यादा महंगी ज्यादा दवाईयां लिखें ऐसे व्यक्ति मानते हैं कि मंहगी दवाई सस्ती दवाई की तुलना में ज्यादा असरदार होती है। ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो मामूली शारीरिक व्याधि उठाने पर डाक्टर से सलाह लिए बिना ही दवा की दुकान से व्याधि के उपचार के लिए प्रचारित की जाने वाली पेटेंट दवाएं खरीद कर बिना किसी हिचकिचाहट के उसका सेवन कर लेते हैं। वे यह कतई महसूस नहीं करते कि गलत ढंग से अग्रेजी दवाओं के उपयोग से शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और वे उस रोग के उपचार के बजाय नये रोग को जन्म दे सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति को बुखार आये तो यह जरूरी नही कि वह बुखार मलेरिया ही हो और मलेरिया की दवाई खाना शुरू कर दी जाये, संभव है कि यह वायरल जनित बुखार हो, जिसके लिए मलेरिया की दवाई के सेवन की नहीं बल्कि अन्य गोली लेने पडती है। वायरल बुखार होने पर रोगी को बिना डाक्टर की सलाह के मलेरिया की दवाई देने से रोगी के शरीर पर उसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। चौकाने वाली बात है कि दवा कंपनी से मिलने वाले मोटे कमीशन के चक्कर में चिकित्सक अधिक मंहगी दवाईयां लिख रहे हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के तहत औषधि निर्माण कंपनियां जिस तरीके से बडे पैमाने पर दवाइयां बना रही है, उसी प्रकार चिकित्सक भी रोगी को धड़ाधड़ इन दावों के सेवन का परामर्श दे रहे हैं । मरीज भी ऐसा कर रहा है यही वजह है ,की इन दवाओं के अनचाहे प्रभाव बढ़ते जा रहे हैं। इसके लिए दवा कंपनियों डॉक्टर और मरीज में से किसी एक वर्ग को कसूर बार मानना गलत है । क्योंकि इसमें तीनों का योगदान है। आज के दौर में चिकित्सा क्षेत्र मुनाफाखोरी का जरिया बन चुका है। दवा कंपनियों में आपसी गला काट होड़ मची हुई है। बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा खड़े नही रह पाने के कारण छोटी कंपनियां कभी-कभी नकली दवाई बेचने से बाज नहीं आती ऐसी कई कंपनियां कैप्सूल में चौक या कॉफी का पाउड,र हल्दी पावडर मिलाकर इन दवाओं को सस्ता बेचती है। चिकित्सक अपनी व्यस्तता के चलते यह पता लगाने की स्थिति में नहीं है कि कौन सी दवा नकली है और कौन सी असली? नाम चीन डॉक्टर के पास इतना वक्त नहीं होता कि पर्याप्त वक्त निकाल कर वह मरीज को उसकी दवा और बीमारी के बारे में विस्तृत जानकारी दें सके। तथा कम से कम औषधि के सेवन के लाभ समझा ये। दरअसल दमा के रोगी को ही लीजिए इस रोग के उपचार के लिए सिर्फ सात आठ दवाई है, परंतु बाजार में विभिन्न नाम से अनेक कंपनियों की सैकड़ो दवाई धडल्ले से बिक रही है। जब कभी कोई विशेष ब्रांड की दवा कुछ मरीजों को फायदा कर जाती है तो डॉक्टर व मरीज दोनों उसके पीछे दौड़ पडते हैं । वैसे सभी दवाओं के कुछ न कुछ बुरे असर आवश्यक होते हैं, कोई भी दवा तभी उपयोगी मानी जा सकती है। जब उसके फायदे उसकी बुराइयों से ज्यादा हो, लेकिन कभी कभी यह लाभकारी दवाएं भी व्यक्ति विशेष पर बुरे प्रभाव डालती है, उदाहरणार्थ चमत्कारी दवा पेनासलिन ने अब तक करोड़ लोगों को जीवन रक्षा की है, किंतु कुछ व्यक्तियों में इसके बुरे असर सारे शरीर में लाल चकते से लेकर मृत्यु तक के रूप में सामने आए हैं। कई जाने तो पेनासलिन के परीक्षण के दौरान ही चली ग ई । फेनासेटिन नामक दवा दर्द निरोधक के रूप में सालों से प्रयोग की जाती रही है । लेकिन हाल में गुर्दे के ऊपर उसके बुरे असर का पता चला। तब से दवा के बनाने, बिक्री तथा उसके प्रयोग पर रोक लगा दी गई है। कुछ दबाए ऐसी भी हैं जो हड्डियों तथा दांतों में एकत्रित हो जाती है। टेटरासाइक्लिन नामक दवा इसी प्रकार की है। कुछ बच्चों के दांत इसलिए पीले हो जाते हैं कि उन्होंने बचपन में या जब वे माँ के गर्भ में थे, उनकी मां ने टेटरासाइक्लिन का सेवन किया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ दवाई कभी भी खाली पेट नहीं लेना चाहिए, उन्हें भोजन के पश्चात ही लेना चाहिए, एसि्परीन इसी तरह की दवा है, पूरी दुनिया में लोग प्रति वर्ष आठ करोड़ पौड जितनी अधिक मात्रा में इसका सेवन करते हैं। लेकिन मोटे तौर पर यह रोग को किस प्रक्रिया से प्रभावित करती है, यह तक ज्ञात नहीं हो सका है। उक्त दवा साधारण दर्द से लेकर दिल के दौरे के दौरान प्रयोग की जाती है। हालांकि समस्या यह है कि इसका बुरा असर शरीर में खासकर मस्तिष्क और पेट में रक्त स्राव के रूप में सामने आते है। इसके अलावा प्रत्येक दवा की निधारित खुराक लेना जरुरी है। तभी उसका रक्त में समुचित स्तर कायम रह सकता है। समुचित स्तर की वजह से ही दवा रोगी को लाभदायक रहती है। इसके विपरीत यदि खुराक की मात्रा अधिक हो जाये तो दवा के बुरे असर सामने आ सकते हैं। डाक्टर रोगी को अक्सर एक निश्चित अवधि तक दवा के सेवन की सलाह देते हैं, साधारण तया एंटीबायोटिक दवाओं का कोर्स पांच दिन के लिए होता है। लेकिन क ई रोगी दिन बाद ही आराम पा लेते हैं और दवा का सेवन छोड़ देते हैं लेकिन कुछ दिनों के पश्चात जब उन्हें वैसी ही तकलीफ पुनः शुरू होती है तो वे डाक्टर से पूछते हैं कि क्या बाकी तीन दिन तक ये दवाएं और खा लेने से वे फिर ठीक हो जायेगे? यह सच है कि पहले प्रयुक्त की गई दवा के प्रति रोगणुओं में प्रतिरोध विकसित हो जाता है और इस प्रकार यह दवा बेअसर साबित होती है। आधुनिक अनुसंधानों ने अब इस बात की पुष्टि की है कि गर्भस्थ शिशु पर विभिन्न प्रकार की आवाजों, संगीत तथा मां की भावनाओं का भी असर पड़ता है, इस के अलावा यदि माँ चाय, काफ़ी, क्रीम इत्यादि के सेवन की आदि है तो उसका असर गर्भस्थ शिशु पर पडता है। यह देखने में आया है कि जो बच्चे विकलांग उत्पन्न होते हैं, उनकी माताएं गभावस्था में अनेक प्रकार की दवाईयों का सेवन करती थी, जो दवाएं इस तरह का नुकसान पहुंचाती है, हकीकत यह है कि उनका पता तब लगता है जब वे क ई हजार बच्चों को विकलांग बना चुकी होती है, टेटारासाइकिलन, थैलीडोमाइड, आदि ऐसी ही दवाएं है जिनके बारे में काफी नुकसान होने के बाद एहतियात बरती गयी। माँ को मिरगी होने पर दी जाने वाली दवाओं के कारण ऐसे बच्चे उत्पन्न हुए जिनके पैर गदानुमा तथा उनके होठ कटे हुए थे। विटामिन ए आयोडीन, नशीली दवाओं तथा हारमोस के ज्यादा सेवन से शिशुओ में विभिन्न प्रकार की विकलांगता होने के प्रमाण सामने आ चुके हैं। दवाओं की दुकान पर जाने पर शोकेस में टानिक व विटामिन नजर आते है। जो लुभावनी बोतलों, शीशियों तथा कैप्सूल या गोलियों के रुप में होते हैं। इनकी निर्माणकर्ता कंपनी उनके बारे में दावा करती है कि ये औषधियाँ मांसपेशियां बढाने, दिमाग ज्यादा तेज करने, स्नायु तंत्र शातिशाली बनाने, भूख तेज करने और जीवन शक्ति , बढाने वाली है, जबकि असलियत यह है कि अधिकतर ऐसे टानिक, विटामिन वैसा सकारात्मक असर नहीं डालते । प्रृथक -पृथक निर्माण कंपनियां अपने-अपने टानिकों को एक दूसरे से अलग-अलग बताती हैं ,जबकि इन सभी में विटामिन ग्लसरो फास्फेट तथा लोह तत्व के अतिरिक्त कभी-कभी कैफीन शराब जैसी चीज मिलाई जाती है। ये शायद ही वे सकारात्मक स्वास्थ्यवर्धक व शक्तिशाली प्रभाव दे पाते हैं। जिनका जोर-जोर से प्रचार किया जाता है हां कुछ मरीजों में जिनमें वास्तव में लोह तत्व या विटामिन की कमी है उनका मामूली फायदा अवश्य पहुंचता है मगर वैसी हालत में इन बनावटी महंगे टानिकों को क्रय करने की क्या आवश्यकता है। जबकि बाजार में लोह तत्व या विटामिन युक्त सस्ती दवाइयां आसानी से उपलब्ध है। विश्लेषण से स्पष्ट है कि समाज में दबाओं की लत दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है, जिस पर अंकुश लगाना अत्यंत जरूरी है। औषधि निर्माता कंपनी और डॉक्टर को महज मुनाफाखोरी की दृष्टि से नहीं सोचना चाहिए ,बल्कि जन स्वास्थ्य की भी वास्तविकताओं के साथ भी उन्हें तालमेल बैठने पर जोर देना चाहिए। (लेखक के विषय में- मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है) ईएमएस / 18 अप्रैल 26