21-Apr-2026


नई दिल्ली (ईएमएस)। कोर्ट के निर्देश पर किए गए एक सर्वे में खुलासा हुआ कि 2024 में भेजे गए 261 हिरणों में से 17 ही जंगल में जीवित मिले। कई हिरणों की हड्डियां मिलीं और कुछ के पैरों में रस्सियां तक बंधी थीं। इस विरोध में एनिमल वेलफेयर सोसाइटी ऑफ इंडिया, न्यू दिल्ली नेचर सोसाइटी, वॉक फॉर एनिमल्स एंड हैबिटेट और कैंपेन फॉर डिफरेंटली एबल्ड जैसे कई संगठन शामिल हुए। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू और टेरी के छात्र-शिक्षकों के साथ-साथ इलाके के बुजुर्ग मॉर्निंग वॉकर्स भी इस अभियान में शामिल हुए। सभी का एक ही सवाल था, क्या इन मासूम चीतल हिरणों को शिकारियों के बीच भेजना सही है? प्रदर्शनकारियों ने बताया कि चीतल हिरण स्वभाव से बेहद शर्मीले होते हैं और बाघ जैसे शिकारी जानवरों के सामने उनका बचाव बेहद कमजोर होता है। ऐसे में उन्हें राजस्थान के टाइगर रिजर्व में भेजना उनके लिए मौत के मुंह में धकेलने जैसा है। यह भी सामने आया कि देश के कई अभयारण्यों में पहले ही हिरणों की संख्या बाघों और चीता जैसे शिकारी जीवों के कारण तेजी से घटी है। एक समय में राजस्थान के जंगलों में चीतल हिरणों के बड़े झुंड देखने को मिलते थे, लेकिन अब रणथंभौर से मुकुंदरा तक का इलाका लगभग खाली हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीता प्रोजेक्ट के बाद से शिकार बनने वाले जीवों की संख्या तेजी से कम हुई है, जिससे शिकारी जानवर अब गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। कोर्ट के निर्देश पर किए गए एक सर्वे में खुलासा हुआ कि 2024 में भेजे गए 261 हिरणों में से केवल 17 ही जंगल में जीवित मिले। कई हिरणों की हड्डियां बिखरी मिलीं और कुछ के पैरों में रस्सियां तक बंधी थीं। इतना ही नहीं, एक पिंजरे में मोर का शव सड़ता हुआ मिला, जो वन विभाग की लापरवाही को उजागर करता है। डीडीए के पास इस बात का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है कि ट्रकों में भरकर 14 घंटे की यात्रा के बाद कितने हिरण जिंदा बचे। गर्भवती मादा हिरणों और अन्य जानवरों के साथ क्या हुआ, इसका भी कोई हिसाब नहीं है। यह भी आशंका जताई गई कि रास्ते में कुछ जानवरों को मांस व्यापारियों को सौंप दिया गया। अजीत झा/देवेन्द्र/नई दिल्ली/ईएमएस/21/ अप्रैल /2026