राष्ट्रीय
23-Apr-2026
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:: अल्पसंख्यक आयोग के सेमिनार में विकसित भारत के लिए जैन सिद्धांतों को बताया गया मूल मंत्र :: इंदौर (ईएमएस)। परोपकार और सेवा जैन समाज की मूल परिभाषा है। अस्पताल, धर्मशालाएं और गौशालाएं इस समाज की निस्वार्थ सेवा भावना का जीवंत प्रमाण हैं। देश को आज जिन नैतिक मूल्यों की आवश्यकता है, वे जैन दर्शन के अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांतवाद में पूरी तरह समाहित हैं। उक्त विचार केंद्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने व्यक्त किए। वे गुरुवार को शहर के मैरियट होटल में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार को वीडियो संदेश के माध्यम से संबोधित कर रहे थे। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के सहयोग से आयोजित इस महती संगोष्ठी का मुख्य विषय भारतीय अर्थव्यवस्था, शिक्षा और परोपकार में जैन समुदाय का योगदान रहा, जिसमें देश भर के विद्वानों, उद्योगपतियों और समाजसेवियों ने विमर्श किया। :: कौशल विकास से सशक्त होंगे जैन युवा : जॉर्ज कुरियन कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन ने जैन युवाओं और संस्थानों को मुख्यधारा से जोड़ने की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने पीएम विकास और पीएमजेवीके जैसी योजनाओं का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इन कार्यक्रमों का उद्देश्य कौशल विकास और उद्यमिता के माध्यम से अल्पसंख्यक समुदायों की आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करना है। इस अवसर पर मध्यप्रदेश के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री चैतन्य कुमार कश्यप ने कहा कि राज्य सरकार जैन समाज के व्यापारिक कौशल और नवाचारों को प्रोत्साहित करने के लिए हर संभव सहयोग प्रदान कर रही है। :: सम्मेद शिखरजी की पवित्रता के लिए आयोग सक्रिय :: आयोग की सचिव स्मृति अलका उपाध्याय ने अपने संबोधन में समाज को आश्वस्त किया कि अल्पसंख्यक आयोग उनके हितों और आस्था के केंद्रों की सुरक्षा के लिए सजग है। उन्होंने विशेष रूप से झारखंड स्थित जैनों के सर्वोच्च तीर्थ सम्मेद शिखरजी की पवित्रता से जुड़े संवेदनशील मामले पर कहा कि आयोग इस विषय पर झारखंड सरकार के साथ निरंतर समन्वय कर रहा है। आयोग की सदस्य मुना वारी बेगम और सदस्य बर्जिस देसाई ने भी जैन समुदाय की सेवा और बहुलवाद के प्रति उनकी अटूट निष्ठा की सराहना की। :: जैन दर्शन में वैश्विक समस्याओं का समाधान :: संगोष्ठी के विभिन्न तकनीकी सत्रों में जैन समाज के आर्थिक और दार्शनिक पहलुओं पर गहन मंथन हुआ। विषय विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और प्रत्यक्ष कर संग्रह में जैन समाज का योगदान उनकी जनसंख्या के अनुपात से कई गुना अधिक है। विद्वानों ने तर्क दिया कि अनेकांतवाद का सिद्धांत आज के दौर में वैचारिक मतभेदों को सुलझाने और सामाजिक समरसता बनाए रखने के लिए सबसे सटीक जरिया है। समापन सत्र में अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की सचिव डॉ. श्रीवत्स कृष्णा ने जैन समाज के ऐतिहासिक योगदानों को भविष्य की विकास योजनाओं के साथ एकीकृत करने पर बल दिया। इस गरिमामयी आयोजन में डीएवीवी के कुलपति डॉ. राकेश सिंघई, शांतिलाल मुथा, गिरीश शाह और जैन इंटरनेशनल ट्रेड ऑर्गनाइज़ेशन के प्रतिनिधियों सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्ध जन उपस्थित रहे। प्रकाश/23 अप्रैल 2026