भारत में आजादी के बाद पहली बार मतदान का एक ऐसा रिकॉर्ड बना है, जो ना भूतो ना भविष्यति की तरह है। प्रथम चरण के मतदान के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दावा किया है, प्रथम चरण की जिन 154 सीटों में जो मतदान हुआ है उसमें बीजेपी 120 सीटों पर जीत रही है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव का नॉरेटिव बनाकर महिला आरक्षण बिल को आधार बनाकर बीजेपी ने चुनाव लड़ा है। चुनाव के दौरान संसद का विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन और जनगणना के मुद्दे पर जो संशोधन बिल प्रस्तुत किया था। बिल को महिला आरक्षण से जोड़कर प्रचारित किया गया। महिला आरक्षण बिल अस्तित्व में है। इसके बाद भी जब यह बिल संसद से दो तिहाई बहुमत से पास नहीं हो पाया। उसके बाद भाजपा ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन का मुद्दा बनाया। महिला आरक्षण के नाम पर बंगाल और तमिलनाडु में चुनाव प्रचार किया। जो मतदान हुआ है, उस पर भाजपा का दावा है, महिलाओं ने भाजपा के पक्ष में पश्चिम बंगाल में बढ़ चढ़कर मतदान किया है। तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 86 फ़ीसदी रिकॉर्ड मतदान हुआ है। तमिलनाडु में भी महिलाओं ने एनडीए के पक्ष में मतदान किया है, यह दावा भाजपा द्वारा किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में चुनाव के पहले, इसी तरह का नॉरेटिव बनाकर भाजपा अप्रत्याशित रूप से चुनाव जीतती रही है। इस बार भी भाजपा को भरोसा है, वह पश्चिम बंगाल में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही हैं। ठीक इसके विपरीत ममता दीदी का दावा है। इस बार महिलाओं ने एसआईआर के नाम पर जिस तरह से करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काटे गए हैं। तार्किक विसंगति के नाम पर लगभग 64 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अलग किए गए हैं। बंगाल के मतदाता अपना नाम मतदाता सूची में जुड़वाने के लिए पिछले 3 महीने से परेशान हो रहे हैं। किसी भी स्तर पर कोई सुनवाई नहीं हुई। प. बंगाल के करोड़ों मतदाता इस प्रक्रिया में काफी परेशान थे। अंतोंगत्वा 34 लाख से ज्यादा मतदाताओं को प. बंगाल में मतदान से वंचित रखा गया है। इसकी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया बंगाल में हुई है। मतदाताओं को अपनी नागरिकता बचाने के लिए जो परेशानी उसे हुई है। बंगालियों को जिस तरह से परेशान किया गया है। उससे नाराज मतदाताओं ने इस बार टीएमसी के पक्ष में मतदान किया है। बंगाली स्मिता और नागरिक अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए कम्युनिस्ट विचारधारा के मतदाताओं ने भी टीएमसी के पक्ष में मतदान किया है। ममता बनर्जी का दावा है, भारी संख्या में जो मतदान हुआ है। वह एसआईआर के विरोध और बंगाली अस्मिता को बचाए रखने के लिए हुआ है। ममता बनर्जी का दावा है, वह भारी बहुमत के साथ चौथी बार अपनी सरकार बनाने जा रही हैं। बंगाल चुनाव पर गहरी नजर रख रहे राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है, इस बार का विधानसभा चुनाव परिणाम आश्चर्यचकित करने वाला होगा। पिछले 15 वर्षों के चुनाव परिणाम को देखने पर स्पष्ट है। कम्युनिस्ट विचारधारा के मतदाता प्रत्येक चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान कर रहे थे। इसका मुख्य कारण कम्युनिस्ट विचारधारा का कमजोर होना और भाजपा द्वारा सुनयोजित रूप से बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करना था। कम्युनिस्ट पार्टी और टीएमसी के बीच में लगातार टकराव बढ़ने का फायदा भाजपा को पिछले 2 लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हुआ है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस बार मामला उल्टा पड़ता हुआ दिख रहा है। जिस तरह से बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है। जिस तरह से देश में घूसपेठियों के नाम बंगालियों को निशाने पर लिया गया है। उसके कारण बंगाली अस्मिता और एसआईआर के विरोध में पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने भारी मतदान किया है। पश्चिम बंगाल में जिस तरह से चुनाव के पहिले भय का वातावरण, चुनाव के पहले चुनाव आयोग, सुरक्षा बलों एवं हिंदू कट्टरता के नाम पर बनाया गया उससे पश्चिम बंगाल का मतदाता नागरिक अधिकारों को लेकर सजग हुआ है। पहली बार वामपंथी विचारधारा को छोड़कर ममता दीदी के पक्ष में मतदान किया है। पश्चिम बंगाल के इतिहास में ऐसा परिवर्तन पहली बार होता हुआ दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को पूंजीवादी विचारधारा का समर्थक माना जाता है। पिछले 15 वर्षों में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी का कमजोर होना पूंजीवादी व्यवस्था का मजबूत होना भाजपा के पक्ष में था। अब, जिस तरह से निम्न वर्ग नागरिकता, बेरोजगारी और महंगाई का सामना कर रहा है, उससे पश्चिम बंगाल का मतदाता भाजपा से भारी नाराज है। प्रथम चरण के मतदान में जिस शांति के साथ भारी संख्या में घरों से निकलकर मतदाताओं ने मतदान किया है। उससे यह संकेत मिल रहा है, इस बार पश्चिम बंगाल में ऐसा कुछ होने जा रहा है, जो भविष्य में प. बंगाल एवं देश की राजनीति को नई दिशा देगा। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। बांग्लादेश के चुनाव में जिस तरह के हालत थे। बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने जिस तरह से प्रधानमंत्री शेख हसीना के पक्ष में काम किया था। उसके बाद बांग्लादेश में विद्रोह हुआ, शेख हसीना को बांग्लादेश छोड़कर भारत में शरण लेना पड़ी। एसआईआर के नाम पर लाखों मतदाताओं के वोट काटने की बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया पश्चिम बंगाल में हुई है। बंगाली समुदाय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से लेकर अभी तक के हर मामले में मुखर रहता आया है। प्रथम चरण के मतदान में जिस तरह के रुझान आए हैं, वह बहुत कुछ कह रहे हैं। परिणाम आने के बाद प्रदेश एवं देश में इसकी तीव्र राजनैतिक प्रतिक्रिया होना तय है। ईएमएस / 24 अप्रैल 26