लेख
24-Apr-2026
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले द्वारा स्टेनफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में आयोजित ‘थ्राइव 2026’ सम्मेलन में दिया गया व्याख्यान भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैश्विक पुनर्पाठ का सशक्त उदाहरण बनकर उभरा। “विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व” विषय पर बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक तकनीकी युग में केवल इंनोवेशन पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके साथ विसडम का समावेश अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। उपनिषद जैसे ग्रंथ मानव चेतना, प्रकृति और ब्रह्मांड के संबंधों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। इस संदर्भ में उनका यह कथन अत्यंत प्रासंगिक रहा कि विवेकहीन ज्ञान अहंकार को जन्म देता है, जबकि विवेकयुक्त ज्ञान ही कल्याणकारी होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के दौर में उन्होंने ‘मानवीय एल्गोरिद्म’ की अवधारणा रखी, जिसमें तकनीक का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, न कि मनुष्य का तकनीक का दास बन जाना। उन्होंने ज्ञान के लोकतंत्रीकरण पर बल देते हुए कहा कि सूचना और शिक्षा तक समान पहुँच आज की सबसे बड़ी चुनौती है। अपने व्याख्यान में दत्तात्रेय होसबले ने यह भी रेखांकित किया कि विदेशी आक्रमणों और परतंत्रता के कारण भारतीय ज्ञान-परंपराओं को गहरी क्षति पहुँची, किंतु आज नई शिक्षा नीति जैसे प्रयासों से उन्हें पुनर्जीवित करने की दिशा में काम हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष में यह व्याख्यान केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की समग्र दृष्टि को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का प्रयास है। आधुनिक विज्ञान और भारतीय दर्शन के संगम का यह संदेश एक संतुलित, समावेशी और टिकाऊ वैश्विक भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। ईएमएस / 24 अप्रैल 26