राष्ट्रीय
26-Apr-2026
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-लोकसभा-विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग परिणाम एक जैसे नहीं होते, विश्लेषण से समझें नई दिल्ली,(ईएमएस)। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के पहले चरण में दर्ज की गई बंपर वोटिंग ने एक बार फिर चुनावी पंडितों और राजनीतिक दलों के बीच बहस छेड़ दी है कि आखिर रिकॉर्ड मतदान के मायने क्या होते हैं। बंगाल में 92 फीसदी से ज्यादा मतदान अपने आप में एक नया कीर्तिमान है। यह सवाल हर चुनाव में उठता है कि जब इतनी बड़ी संख्या में मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तो क्या यह मौजूदा सरकार के खिलाफ जन असंतोष का संकेत होता है, या फिर सत्ताधारी पार्टी के पक्ष में मजबूत लामबंदी? ज्यादा वोटिंग असंतोष या उत्साह दोनों का संकेत हो सकती है। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ऐसे कई मौके आए हैं, जब रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग हुई है, लेकिन इसके परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं रहे। 2021 में जब पश्चिम बंगाल में पिछली बार विधानसभा चुनाव हुए थे, तब भी 80फीसदी से ज्यादा मतदान हुआ था, भारतीय चुनाव आयोग के मुताबिक यह आंकड़ा 82फीसदी था। उस समय भी मुकाबला टीएमसी और बीजेपी के बीच था। भारी मतदान को अक्सर एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर माना जाता है, लेकिन जब नतीजे आए तो टीएमसी ने और भी जोरदार तरीके से सत्ता बरकरार रखी। यह दर्शाता है कि ज्यादा मतदान हमेशा सत्ता विरोधी लहर का संकेत नहीं होता, बल्कि कभी-कभी यह मौजूदा सरकार के पक्ष में भी मतदाताओं को लामबंद करता है। 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनावों में कुल मतदान 57फीसदी रहा था। इस चुनाव में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड ने लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया था, जिसका मुकाबला बीजेपी से था। भारी मतदान ने सामाजिक समीकरणों को सक्रिय किया और महागठबंधन ने ऐतिहासिक जीत हासिल करते हुए सत्ता परिवर्तन किया। 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए 61फीसदी रिकॉर्ड मतदान हुआ था। भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दे प्रमुख थे। इस मतदान ने बीजेपी को जीत दिलाई, जबकि तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव के बाद योगी मुख्यमंत्री बने। 2018 में त्रिपुरा में हुए इस चुनाव में करीब 89फीसदी मतदान हुआ, जो उस समय भारत में सबसे ज्यादा वोटिंग में से एक था। त्रिपुरा में पिछले 25 सालों से सीपीआईएम का शासन था, लेकिन इस वोटिंग ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया। बीजेपी ने जीत के साथ वहां सरकार बनाई, जिससे वामपंथी किला ढह गया। 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनावों में 67फीसदी मतदान हुआ था। भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के बाद अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। इस चुनाव में रिकॉर्ड मतदान ने आम आदमी पार्टी को 70 में से 67 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दिलाई और केजरीवाल की सत्ता में वापसी सुनिश्चित की। लोकसभा चुनावों में अधिक मतदान 2019 लोकसभा चुनाव में रिकॉर्ड 67.40फीसदी मतदान हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने 353 सीटें जीतीं। नरेंद्र मोदी दोबारा पीएम बने। यहां ज्यादा मतदान ने सत्ताधारी पार्टी को और मजबूत किया। 2014 लोकसभा चुनाव में 66.44फसदी वोट डाले गए, जो एक रिकॉर्ड था। बीजेपी ने 282 सीटें जीती और एनडीए 336 सीटों के साथ मिलकर सरकार बनाई। नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने। यह मतदान बदलाव के लिए पड़ा था, जिसने केंद्र में कांग्रेस सरकार का सफाया कर दिया। 1984 लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद हुए इस चुनाव में कुल 64.1फीसदी वोट पड़े। कांग्रेस ने सहानुभूति लहर पर सवार होकर रिकॉर्ड 414 सीटें जीतीं, जिससे सत्ताधारी पार्टी को कहीं अधिक ताकत मिली। जहां उच्च मतदान के परिणाम मिले-जुले रहे, वहीं कम मतदान वाले मामलों में भी कोई निश्चित पैटर्न नहीं दिखा है। 1971 में लोकसभा चुनावों में सबसे कम वोटिंग 41.33फीसदी के बावजूद कांग्रेस सत्ता में बनी रही। 1980 में 56.9फीसदी वोटिंग के साथ जनता पार्टी को हार मिली और कांग्रेस वापस सत्ता में आई। 1989 में वोटिंग घटी, वी पी सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी सत्ता में बदली। 1991 में वोटिंग फिर घटी, लेकिन कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी। कुल मिलाकर पिछले 12 लोकसभा चुनावों में पांच बार वोटिंग घटी, जिनमें चार बार सरकार बदली लेकिन एक बार सत्ताधारी पार्टी बनी रही। विधानसभा चुनावों में भी कम टर्नआउट के मिश्रित परिणाम देखने को मिले हैं। कई मामलों में सत्ताधारी पार्टी हारी, जबकि कुछ में कम वोटिंग के बावजूद सत्ताधारी जीती। यह स्पष्ट है कि भारत के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में रिकॉर्ड वोटिंग के परिणाम हमेशा एक जैसे नहीं होते। यह कभी सत्ताधारी पार्टी को मजबूत करती है तो कभी सत्ता परिवर्तन का कारण बनती है। ज्यादा वोटिंग असंतोष या उत्साह दोनों का संकेत हो सकती है। चुनावों में स्थानीय मुद्दे, सामाजिक समीकरण, मतदाता का मूड और तात्कालिक परिस्थितियां सबसे अहम होती हैं। इसलिए केवल मतदान प्रतिशत के आधार पर किसी भी चुनावी नतीजे का अनुमान लगाना भ्रामक साबित होता है। सिराज/ईएमएस 26 अप्रैल 2026